बर्लिन की उच्च अदालत ने इस मामले में माता-पिता और फेसबुक को कोर्ट के बाहर समझौता करने का मौका भी दिया, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। बता दें कि लड़की की मौत 5 साल पहले बर्लिन के एक सब-वे स्टेशन पर ट्रेन के सामने आ जाने से हुई थी। लेकिन अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि ये कोई दुर्घटना थी या खुदकशी। कोर्ट के सामने अब ये सवाल था कि डिजिटल खातों को भी अनुरूप संपत्ति (एनालॉग संपत्ति) के दायरे में रखा जाए या नहीं। हालांकि बर्लिन की एक स्थानीय अदालत ने साल 2015 में माता-पिता के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे फेसबुक ने उच्च अदालत में चुनौती दी थी।
स्थानीय अदालत ने फैसला सुनाते समय यह तर्क दिया था कि एनालॉग और डिजिटल संपत्तियों के साथ समान रुख नहीं अपनाया जाए तो यह विरोधाभास पैदा होगा कि चिट्ठी-पत्र, डायरी, सामग्री के लिहाज से स्वतंत्र हैं लेकिन ईमेल और फेसबुक नहीं। अदालत ने कहा था कि बेटी की निजी संपत्ति पर माता-पिता की पहुंच से निजी अधिकार का उल्लघंन नहीं होता क्योंकि उन्हें यह जानने का पूरा हक है कि उनके नाबालिग बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं।
उच्च अदालत ने भी अब माता-पिता के पक्ष में ही फैसला दिया है। माता-पिता अब अपनी मृत बेटी के फेसबुक अकाउंट को एक्सेस कर पाएंगे। इस फैसले को ऐतिहासिक बताया जा रहा है, क्योंकि इससे यह साफ हो गया है कि मरने के बाद आपके फेसबुक अकाउंट का क्या होगा? आपके जाने के बाद आपका फेसबुक अकाउंट किसकी संपत्ति होगा?