सुषमा से सलाह किए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश मामलों में कोई पहल नहीं करते थे। बात मोदी की पहली सरकार की है जब 15 दिसंबर 2015 को करीब 12 बजे दिन में पीएम मोदी के दिमाग में पाकिस्तान से नए संबंध की शुरुआत का नायाब लेकिन जोखिम भरा आईडिया आया। मोदी अफगानिस्तान के काबूल में नए संसद भवन का उद्घाटन कर लौटे रहे थे। उन्होंने बिना किसी को बताए तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को दिल्ली फोन मिलाया और कहा, वह काबूल से लौटते वक्त लाहौर में रुककर नवाज शरीफ से मिलना चाहते हैं। सुषमा पहले तो कुछ स्तब्ध हुईं लेकिन जल्द ही मोदी के मन की दूरगामी योजना को समझ गईं।
पाठनकोट हमले के बाद बैक ग्राउंड ब्रीफिंग के दौरान सुषमा ने भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने की इस ऐतिहासिक पहल की पर्दे के पीछे की कहानी बयां की। सुषमा ने कहा, फोन पर पीएम ने आशंका जताई थी कि अगर वह पाकिस्तान रुकते हैं तो देश में कैसा संदेश जाएगा। कोई राजनीतिक हलचल तो नहीं होगी। सुषमा ने कहा कि घरेलू मंच पर जो भी होगा वह उसका समाधान निकालेंगी। आप अपनी सोच पर अमल करें। इसके अच्छे परिणाम निकलेंगे।
सुषमा के आश्वासन के बाद ही मोदी ने पाक के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन कर अपनी योजना बताई। शरीफ ने भी खुले दिल से इसका स्वागत किया और फौरन सारे इंतजाम किए और दो घंटे के भीतर मोदी लाहौर में थे। अफगानिस्तान से उड़ान भरते समय तक इसकी जानकारी खुद मोदी, सुषमा, शरीफ, एनएसए दोभाल और तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर के अलावा किसी को नहीं थी।
इस मुलाकात के दौरान शरीफ ने मोदी को आश्वस्त किया कि बेहतर रिश्तों के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उन्होंने दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) को आतंकवाद से संबंधित सभी मसले को सुलझाने की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव दिया। लगातार एक हफ्ते तक बैक चैनल बातचीत में तेजी से कई मसले हल करने का ब्लू प्रिंट तैयार हुआ। दोनों पीएम ने जिस तरह दिल खोल रहे थे ऐसा लगा कि पूरे दक्षिण एशिया का इतिहास बदलने वाला है।
पाक सेना को रास नहीं आई पहल
सुषमा के मुताबिक मोदी शरीफ मुलाकात के ठीक सात दिन बाद आतंकवादियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला कर दिया। उन्होंने कहा कि दोनों लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पीएम की यह पहल पाक सेना को रास नहीं आ रही थी। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अपने प्यादे आतंकियों से ऐसी चाल चली कि सारा मामला ही खटाई में पड़ गया। भारत में इसकी ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि फिर इस तरह की कोई पहल करने का साहस नहीं किया जा सका।