प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार देर रात अमेरिकी दौरे से वापस लौट आए हैं। उनकी वतन वापसी के साथ ही दिल्ली में सरकार बनाने की गतिविधियों में भी अब तेजी आ जाएगी। अगले दो दिनों के अंदर भाजपा के जीते हुए विधायकों की बैठक में मुख्यमंत्री के नाम पर निर्णय लिया जा सकता है। भाजपा में कई बार जीते हुए विधायकों को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की पसंद बता दी जाती है, और सभी विधायक उस पर अपनी सहमति दे देते हैं। यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही यह तय करेंगे कि दिल्ली में कौन मुख्यमंत्री बनेगा। दिल्ली में भाजपा की जीत के बाद और पीएम मोदी के विदेश दौरे को देखते हुए पूर्व में ही इस बात के संकेत दे दिए गए थे कि सीएम के लिए अंतिम नाम पर मुहर पीएम के वापस आने के बाद ही लगेगी।
माना यही जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विधानसभा स्पीकर और छः मंत्रियों जैसे अहम पदों पर बनिया, महिला, पंजाबी, जाट, पूर्वांचली और अन्य समुदायों के नेताओं को उचित प्रतिनिधित्व देकर इन सबको साधने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा में मुख्यमंत्री के चयन के द्वारा हमेशा एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जाती है। उस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश की जाती है जिसके द्वारा समाज के एक बड़े वर्ग को संदेश दिया जा सके। जैसे माना जाता है कि भाजपा ने मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर यूपी-बिहार तक के यादव समुदाय के मतदाताओं को यह संदेश देने का काम किया था कि यदि समाजवादी पार्टी और राजद में केवल एक परिवार के लोग ही मुख्यमंत्री-मंत्री और नेता बनते हैं, जबकि भाजपा में साधारण परिवार से आने वाला यादव समुदाय का व्यक्ति भी मुख्यमंत्री बन सकता है। भाजपा ने इसके सहारे यूपी-बिहार की एक प्रभावशाली जाति को अपने साथ लाने की कोशिश की थी। अन्य राज्यों में भी पार्टी इसी तरह समीकरण बिठाने की कोशिश करती है।
दिल्ली में क्या हैं समीकरण
दिल्ली में मुख्यमंत्री बनाने के पहले भाजपा के सामने कई राजनीतिक समीकरण हैं जिसे पार्टी साधने की कोशिश कर सकती है। वह दिल्ली की राजनीति में प्रभावी बनिया और पंजाबी समुदाय के साथ-साथ सिख सरदारों को भी साधने की कोशिश कर सकती है। पार्टी यदि किसी जाट चेहरे पर दांव लगाती है तो उसे इसका लाभ दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक मिल सकता है।
इसी साल के अंत में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। पूर्वांचली मतदाताओं ने दिल्ली में भी भाजपा को जमकर वोट किया है, इसी कारण भाजपा सत्ता तक पहुंचने में सफल रही है। दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में भी सबसे ज्यादा इसी इलाके के लोग रहते हैं। इन्होंने इस बार जमकर भाजपा का समर्थन किया है। चूंकि पार्टी ने केवल चार ही पूर्वांचली चेहरों को इस चुनाव में टिकट दिया था और इस पर पार्टी के पूर्वांचली नेताओं ने नाराजगी भी जाहिर की थी, भाजपा मुख्यमंत्री पद पर किसी पूर्वांचली को अवसर देकर इस वर्ग को साधने का काम कर सकती है। इसका संदेश केवल दिल्ली-बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे यूपी और मध्य प्रदेश तक संदेश जाएगा। यदि ऐसा होता है तो पूर्वांचल के चेहरों में से किसी एक की लॉटरी लग सकती है।
भाजपा के लिए पंजाब अभी भी टेढ़ी खीर साबित हुआ है। पार्टी किसी पंजाबी या सिख समुदाय के नेता को चेहरा बनाकर दिल्ली से लेकर पंजाब तक की राजनीति साधने का काम कर सकती है। भाजपा के पास अभी कोई महिला मुख्यमंत्री के पद पर काबिज नहीं है। यदि पार्टी नेतृत्व के मन में महिलाओं को साधने की बात आती है तो वह रेखा गुप्ता या शिखा राय जैसी किसी महिला को अवसर देकर उन्हें सम्मानित करने का काम कर सकती है।
विधानसभा स्पीकर के नाम पर केवल दो लोगों के नाम
जीते हुए विधायकों में मोहन सिंह बिष्ट सबसे वरिष्ठ हैं। वे छः बार के विधायक बन चुके हैं। उनके अलावा रोहिणी से जीते विधायक विजेंद्र गुप्ता नेता प्रतिपक्ष के पद पर रह चुके हैं। उन्हें सदन का काफी अनुभव है। माना जा रहा है कि विधानसभा स्पीकर के रूप में पार्टी इन्हीं दो नेताओं में से किसी एक का नाम आगे बढ़ा सकती है।
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