पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं अम्मा यानी जे जयललिता का साथ अब उनके चाहने वालों से छूट गया। 75 दिन तक बीमारी की गिरफ्त में रहने के बाद 68 साल की जयललिता ने सोमवार रात अपोलो अस्पताल में जैसे ही अंतिम सांस ली बाहर उनके चाहने वालों पर दुखों का पहाड़ टूट गया। रोते बिलखते लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर आई, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनकी प्रिय नेता उनका साथ छोड़कर जा चुकी है।
अम्मा के प्रति यह दीवानगी बयां करने के लिए काफी है कि वो अपने समर्थकों के लिए वो क्या थीं? उनकी मौत के बाद जिस तरह अस्पताल में एक के बाद एक तमाम बड़े नेताओं की भीड़ जुटी उससे यह भी
साफ हो गया कि तमिलनाडु की राजनीति में वो क्या हैसियत रखती थीं? ऐसे में इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी मौत के बाद तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा खालीपन आ गया है।
और सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि जयललिता के बाद अब क्या होगा तमिलनाडु की राजनीति का? उनके जाने के बाद केंद्र की राजनीति में क्या प्रभाव पड़ेगा? आइए ढूंढते हैं कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब।
पनीरसेल्वम के सामने पार्टी और सरकार को संभालने की चुनौती
जिस समय ममता अस्पताल में अपनी अंतिम सांसे गिन रही थीं उसी दौरान अस्पताल के निचले तले पर एआईएडीएमके के विधायकों की बैठक चल रही थी। जिसमें पार्टी के भविष्य को लेकर मंथन चल रहा था और इस बात पर भी कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? हालांकि इसको लेकर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी और बैठक शुरू होने के कुछ मिनटों बाद ही सभी विधायकों से एक कागज पर हस्ताक्षकर करवा लिए गए जिसमें लिखा था कि वह एक सुर में मुख्यमंत्री पद के लिए वित्तमंत्री पनरीसेल्वम का समर्थन करते हैं।
जया की मौत के दो घंटे बाद ही राज्यपाल ने पनीरसेल्वम को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिलवा दी और इस तरह सत्ता का हस्तातंरण भी खामोशी के साथ हो गया। लेकिन जानकारों की मानें तो यह सिर्फ शुरूआती तूफान को थामने की कवायद भर है, क्योंकि एआईएडीएमके में जया के वजूद का या शायद उनसे आधेभर का कोई नेता नहीं है।
हालांकि पनीरसेल्वम को जया का विश्वासपात्र माना जाता है इसलिए उनकी अनुपस्थिति में दो बार सत्ता संभालने का अवसर उन्हें ही मिला लेकिन जया अब नहीं हैं ऐसे में उनका प्रभाव भी अब पनीरसेल्वम के साथ नहीं है। इसलिए पार्टी में गुटबाजी और उनके खिलाफ विरोध की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा पनीरसेल्वम के लिए बड़ी चुनौती है सरकार के साथ साथ पार्टी में सामंजस्य बनाए रखना। पार्टी के विधायकों पर तो उनका प्रभाव माना जा सकता है लेकिन वही प्रभाव पार्टी के लोकसभा और राज्यसभा सांसदों पर भी बना रहेगा यह कहना मुश्किल है। ऐसे में गुटबाजी और विरोध की चिंगारी कब कहां से सुलग उठे यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
भाजपा के लिए बन सकती हैं संभावनाएं
- फोटो : SELF
तमिलनाडु की राजनीति से जया के जाने के बाद अगर किसी पार्टी को राज्य में राजनीतिक लाभ हो सकता है तो वह है भाजपा। जो लाख प्रयास के बाद भी अभी तक दक्षिण के इस राज्य में अपनी पुख्ता पहचान नहीं बना सकी थी। हालांकि मोदी लहर में हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी ने एक सीट के साथ कुल 5.56 फीसदी वोट हासिल किए थे और वो कांग्रेस से भी आगे रही थी, जिसका खाता भी नहीं खुल सका था।
हालांकि विधानसभा चुनावों में पार्टी का ग्राफ फिर गिरा लेकिन उम्मीदें कायम रहीं। ऐसे में जया के जाने के बाद पार्टी नए सिरे से एक बार फिर कवायद कर सकती है। दूसरी ओर राज्य में मौजूद दूसरे राष्ट्रीय दल कांग्रेस का वजूद लगातार घटा है उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि वह अभी तक स्थानीय दलों का पिछलग्गू ही बना हुआ है।
कभी डीएमके तो कभी एआईएडीएमके के साथ ही मिलकर कांग्रेस विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ती रही है जबकि भाजपा अलग अपनी राह तैयार कर रही है। माना जा रहा है कि भाजपा सुपरस्टार
रजनीकांत पर भी दांव लगा सकती है।
दो साल पहले भाजपा ने रजनीकांत को इसके लिए ऑफर भी किया था लेकिन तब उन्होंने इंकार कर दिया था। लेकिन बदली परिस्थितियों में भाजपा एक बार फिर इस दांव को आजमा सकती है वैसे भी राज्य की राजनीति में फिल्मी सितारों का हमेशा से दबदबा रहा है।
डीएमके को अभी करना होगा इंतजार
- फोटो : Getty
जया के निधन के बाद मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने भी अपनी संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं। संभावना इस बात की भी है कि पार्टी एआईएडीएमके में फूट डालने का प्रयास कर सकती है। क्योंकि विधानसभा चुनावों में अभी चार साल हैं ऐसे में इस बात की संभावना कम ही है कि करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके चार साल तक मौके का इंतजार करे।
हालांकि राजनीतिक के जानकार मानते हैं कि ऐसा करना डीएमके के लिए लंबे समय के लिए हानिकारक हो सकता है। ऐसे में उसके लिए फिलहाल मौके का इंतजार करना ही बेहतर है, लेकिन राजनीति में सब्र बड़ा मुश्किल माना जाता है वो भी मौका सामने हो तो और ज्यादा मुश्किल। ऐसे में सबकी निगाहें डीएमके और सुप्रीमो करणानीधि पर टिकी हुई हैं जो बीते सात साल से राज्य की सत्ता से दूर हैं।
शशिकला के हाथों में आ सकती है पार्टी की बागडोर
सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल है कि बदलती परिस्थितियों में जयललिता की खास सहेली शशिकला की भूमिका क्या होगी? यूं तो पनीरसेल्वम को राज्य का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया गया है लेकिन इसके पीछे भी शशिकला का प्रभाव माना जाता है। पनीरसेल्वम को भी शशिकला का नजदीकी माना जाता है इन्हीं नजदीकियों की वजह से जया ने दो बार अपनी कुर्सी पनीरसेल्वम को सौंपी थी।
जया पर शशिकला का कितना प्रभाव था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शशिकला के भतीजे वीएन सुधारकन को अपना दत्तक पुत्र घोषित कर दिया था। हालांकि बाद में जया के राजनीतिक जीवन पर इसका प्रभाव पड़ा तो उन्होंने दोनों को खुद से दूर कर दिया। बाद में शशिकला की वापसी हुई लेकिन सुधाकरन की नहीं।
जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद शशिकला लगातार उनके नजदीक रही। बदलती परिस्थितियों में शशिकला की भूमिका फिर महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि राज्य सरकार में उनके समर्थकों की अच्छी खासी तादाद है तो राज्यसभा सांसद होने के कारण केंद्र में भी वह पार्टी के चेहरे के तौर पर शामिल रही हैं। ऐसे में साफ है कि जल्द ही पार्टी की बागडोर शशिकला के हाथों में आ जाए।