तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद राज्य और केन्द्र की राजनीति में फेरबदल आना तय सा माना जा रहा है। तमिलनाडु में पिछले चार दशकों से कोई भी राष्ट्रीय दल (बीजेपी या कांग्रेस) अपने पैर नहीं जमा पाया है। वर्ष 1967 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम थे। इसके बाद से प्रदेश की राजनीति ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK)और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)के बीच ही झूलती रही है। लेकिन जयललिता के निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा है कि बीजेपी को तमिलनाडु में राजनीतिक जमीन तलाशने में मदद मिल सकती है ? क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी की जयललिता से ठीक-ठाक बनती थी। जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद केन्द्र सरकार लगातार उनके स्वास्थ्य की जानकारी के लिए संपर्क में था। केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने अस्पताल में जाकर उनका हाल-चाल जाना।
ऐसे में माना जा रहा है कि अब तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी के लिए रास्ता खुल सकता है। अम्मा के निधन के बाद बीजेपी उनकी पार्टी में उभरने वाली कमजोरियों का तमिलनाडु की राजनीति में फायदा उठा सकती है। बीजेपी वहां लगातार अपनी जमीन तैयार करने में जुटी हुई है। अगर उसे वहां बेहतर स्थानीय चेहरा मिल जाए तो वह एक विकल्प के रूप में खड़ी हो सकती है। क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में लोकल चेहरों का बहुत महत्व होता है। अगर बीजेपी को वहां अपनी जमीन बनानी है तो उसे कोई प्रभावी लोकल चेहरा आगे करना होगा।
करुणानिधि भी 92 साल के हैं। ऐसे में बीजेपी को अपनी जमीन मजबूत करने में सफलता मिल सकती है। पन्नीरसेल्वम सीएम बन गए हैं । वे जयाललिता के करीबी थे, लेकिन कई विधायक उन्हें पसंद नहीं करते। इसीलिए विधायकों से लिखित में लिया गया है। सरकार का करीब 4 साल का टेन्योर बाकी है। ऐसे में संभव है कि कुछ समय बाद विद्रोह पनपे। इस विद्रोह का फायदा बीजेपी उठा सकती है। हालांकि अभी तमिलनाडु विधानसभा में बीजेपी का एक भी विधायक नहीं है।