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जयललिता का ना रहना क्या बीजेपी के लिए राजनीतिक रास्ते खोलेगा ?

Tue, 06 Dec 2016 01:26 PM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, नई दिल्ली
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फाइल फोटो - फोटो : getty images
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तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद राज्य और केन्द्र की राजनीति में फेरबदल आना तय सा माना जा रहा है। तमिलनाडु में पिछले चार दशकों से कोई भी राष्ट्रीय दल (बीजेपी या कांग्रेस) अपने पैर नहीं जमा पाया है। वर्ष 1967 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम थे। इसके बाद से प्रदेश की राजनीति ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK)और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)के बीच ही झूलती रही है। लेकिन जयललिता के निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा है कि बीजेपी को तमिलनाडु में राजनीतिक जमीन तलाशने में मदद मिल सकती है ? क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी की जयललिता से ठीक-ठाक बनती थी। जयललिता के अस्पताल में भर्ती होने के बाद केन्द्र सरकार लगातार उनके स्वास्थ्य की जानकारी के लिए संपर्क में था। केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने अस्पताल में जाकर उनका हाल-चाल जाना।
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ऐसे में माना जा रहा है कि अब तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी के लिए रास्ता खुल सकता है। अम्मा के निधन के बाद बीजेपी उनकी पार्टी में उभरने वाली कमजोरियों का तमिलनाडु की राजनीति में फायदा उठा सकती है।  बीजेपी वहां लगातार अपनी जमीन तैयार करने में जुटी हुई है। अगर उसे वहां बेहतर स्थानीय चेहरा मिल जाए तो वह एक विकल्प के रूप में खड़ी हो सकती है। क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में लोकल चेहरों का बहुत महत्व होता है। अगर बीजेपी को वहां अपनी जमीन बनानी है तो उसे कोई प्रभावी लोकल चेहरा आगे करना होगा। 

करुणानिधि भी 92 साल के हैं। ऐसे में बीजेपी को अपनी जमीन मजबूत करने में सफलता मिल सकती है। पन्नीरसेल्वम सीएम बन गए हैं । वे जयाललिता के करीबी थे, लेकिन कई विधायक उन्हें पसंद नहीं करते। इसीलिए विधायकों से लिखित में लिया गया है। सरकार का करीब 4 साल का टेन्योर बाकी है। ऐसे में संभव है कि कुछ समय बाद विद्रोह पनपे। इस विद्रोह का फायदा बीजेपी उठा सकती है। हालांकि अभी तमिलनाडु विधानसभा में बीजेपी का एक भी विधायक नहीं है।
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जयललिता की गैर-मौजूदगी का फायदा उठा सकती है बीजेपी ?

वहीं केंद्र की राजनीति में भी जयललिता का ना रहना गेम चेंज कर सकती है। बीजेपी के लिए संसद में खासकर राज्यसभा में ‘पॉलिटिकल स्पेस’ बनाने की संभावनाएं जयललिता के निधन के बाद प्रबल हो सकती है। बता दें कि राज्यसभा में AIADMK के 11 सांसद हैं। तमिलनाडु में अभी विधानसभा चुनाव होने में चार साल बाकी है और वहां पार्टी सतारुढ़ है। ऐसे में राज्यसभा में AIADMK के सदस्यों की संख्या बढ़ती ही जाएगी। राज्यसभा में फिलहाल बीजेपी/एनडीए अल्‍पमत में है। जयललिता पर बीजेपी की खास नजर पहले भी थी, और अब और बढ़ेगी। क्योंकि तमिलनाडु के चुनाव में जयललिता के खिलाफ बीजेपी कुछ भी बोलने में सावधानी बरती थी और जीत के बाद सबसे पहले बधाई नरेंद्र मोदी ने जयललिता को दी थी। जीएसटी पर भी जयललिता ने पीएम मोदी से मुलाकात के बाद समर्थन का एलान किया था।

हालांकि नोटबंदी के मु्द्दे पर सरकार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल मुसीबत में साथ देने वाले AIADMK के रुख को लेकर भी रहा। लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी नोटबंदी के मुद्दे पर कांग्रेस की अगुआई वाली विपक्ष के साथ दिख रही है। AIADMK ही ऐसी पार्टी थी, जो तटस्थता के नाम पर कई मौकों पर सरकार का साथ निभा चुकी है। लेकिन नोटंबदी के मुद्दे पर संसद और संसद के बाहर कांग्रेस के साथ नजर आई । हालांकि बाद में ऐसी भी खबर आई कि AIADMK दस सांसद अपनी पार्टी के कांग्रेस ने नेतृत्व में नोटबंदी के खिलाफ प्रदर्शन के फैसले को लेकर नाराज हैं। हालांकि उस समय जयललिता अस्पताल में थीं। 

केंद्र सरकार को जयललिता के रहते हुए तमिलनाडु की परियोजनाओं को क्लीयर करने के बारे में कड़े रुख का सामना करना पड़ता था। संभव है कि जयललिता की गैर-मौजूदगी में ऐसा न हो। केंद्र को अब कावेरी नदी के बंटवारे और मुल्ला पेरियार बांध के मामले में भी कुछ राहत महसूस होगी क्योंकि इन मामलों में जयललिता के रुख से कर्नाटक और केरल हमेशा भयभीत रहते थे। जयललिता के निधन से संघीय ढांचे में केंद्र-राज्य संबंधों पर भी असर नजर आएगा। 
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