चारों राज्यों के 120 गांवों के करीब 10 हजार लोगों को न केवल शौचालय के उपयोग और उपयोगिता की जानकारी दी गई वहीं इस अभियान से जुड़े करीब हजारों कर्मचारियों से बात भी की गई। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (नई दिल्ली), अमेरिका की पेंसिलवेनिया, कैलिफोर्निया, टेक्सास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस पूरे शोध को अंजाम दिया है।
शोध कर रहे अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीण भारत में खुले की सोच की समस्या की मुख्य वजह जातिवाद और छुआछूत है। अगर स्वच्छ भारत अभियान को पूरी तरह अमलीजामा पहनाना है तो जातिवाद को खत्म करना होगा। अधिकारी ने बताया कि शोध के दौरान पता चला कि 56 फीसदी लोगों ने कहा कि शौचालय बनवाने या खुले में शौच से रोकने के लिए उनके गांव के लोगों को प्रताड़ित किया गया। बिहार में पुलिस ने एक शख्स को जेल तक में डाल दिया।
सर्वे में यह भी खुलासा हुआ कि कई लोग शौचालय होने के बावजूद करीब 23 फीसदी लोग खुले में शौच कर रहे हैं इनमें 20 फीसदी महिलाएं हैं और 25 फीसदी पुरुष हैं।
टॉयलेट होने के बावजूद 23% लोग खुले में शौच कर रहे, इनमें 20% महिलाएं और 25% पुरुष । स्वच्छ भारत अभियान के तहत लोगों को घरों में शौचालय बनाने के लिए प्रेरित तो किया गया लेकिन इसे प्रयोग भी करना है इस प्रेरणा की कमी दिखी। राज्य सरकारों का दावा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में खुले में शौच जाना लगभग बंद कर दिया है जिसमें उत्तर प्रदेश के 39 फीसदी, बिहार में 60 फीसदी, मध्य प्रदेश में 25 फीसदी और राजस्थान खुले में शौच करने जा रहे हैं। यानी कुल मिलाकर इन राज्यों में औसतन 44 फीसदी लोग खुले में शौच के लिए जा रहे हैं।
हर साल 2 लाख बच्चों की मौत की वजह है खुले में शौच
खुले में शौच की वजह से होने वाले नुकसान पर टेक्सास यूनिवर्सिटी के इकोनॉमिस्ट डीन स्पीयर्स और सोशल साइंटिस्ट डाऐन कॉफी ने शोध किया है। दोनों शोधकर्ताओं ने भारत में खुले में शौच से हो रहे नुकसानों पर शोध की है। शोध में दोनों ने कहा है कि हर साल भारत में करीब 2 लाख बच्चे अपने आसपास के लोगों के खुले में शौच जाने की वजह से अपना पांचवा जन्मदिन नहीं मना पाते हैं । खुले में शौच से फैल रहे संक्रमण की वजह से बच्चों की लंबाई और पोषण पर भी असर पड़ रहा है। शोध में पाया कि खुले में शौच से पैदा होने वाले कीटाणुओं से बच्चों की शारीरिक ही नहीं मानसिक विकास पर भी असर पड़ रहा है।