पांच अगस्त की सुबह संसद भवन स्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय ओर जाने पर रोक लगी हुई थी। इसी कतार में रक्षा मंत्री, गृहमंत्री और विदेशमंत्री का कार्यालय भी है। इस रोक की वजह क्या थी, यह अब स्पष्ट हो चुका है। राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक गृहमंत्री अमित शाह पेश कर चुके थे।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि देश की तमाम रियासतों ने केंद्रीय ढांचे में अपना विलय किया था, तो फिर कश्मीर के साथ अलग व्यवहार क्यों? कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने बढ़ाने का प्रस्ताव लाने के दौरान भी शाह ने कहा था कि धारा 370 अस्थायी है। उन्होंने तभी इसे हटाए जाने का संकेत दिया था और पांच अगस्त को इसकी पुष्टि भी हो गई।
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद के कार्यालय के एक दफ्तरी ने सरकार के इस कदम को स्वर्णिम बताया। कांग्रेस के नेता अश्विनी कुमार ने प्रतिक्रिया में कहा कि पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह के साथ है। जो चाहेंगे अभी कर सकते हैं।
सुबह से ही केंद्रीय गृहमंत्री आत्मविश्वास से भरे हुए थे। सदन में उनके जवाब में साफ झलक रहा था कि केंद्रीय गृहमंत्री ने देश की बहुसंख्यक आबादी की नब्ज टटोल ली है। तीन तलाक विधेयक और सूचना का अधिकार विधेयक को राज्यसभा की मंजूरी दिलाने के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक को मंजूरी दिलाने को लेकर सत्ता पक्ष का विश्वास साफ झलक रहा था।
माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने विधेयक के लिए समर्थन जुटाने की कमान संभाल रखी थी। इससे पहले सूचना का अधिकार (संशोधन विधेयक) और तीन तलाक विधेयक को पारित कराने में भी वह लगातार सक्रिय थे। सोमवार को सत्ता पक्ष का फ्लोर प्रबंधन भी साफ नजर आ रहा था।
विपक्ष की कमजोरी, हिचक और अचानक सबकुछ न समझ पाने की स्थिति प्रेस गैलरी में बैठकर महसूस हो रही थी। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उच्चस्तर पर सतर्कता को बरतते हुए सुरक्षा स्थितियों की मॉनिटरिंग कर रहे थे।