फोन की पूरी घंटी तक नहीं जा पाई थी कि उधर से फोन उठ गया और फोन उठाने वाले ने बहुत घबराई ज़ुबान से कहा, जी...मैं जफर बिलाल हूं...काबुल से। यह नंबर तो इंडिया का लग रहा है। क्या आप एंबेसी से बात कर रहे हैं? मैंने बताया कि मैं जर्नलिस्ट हूं। आपका नंबर मुझे दिल्ली के रिफ्यूजी कॉलोनी में रहने वाले हुसैन से मिला है। मैं आप लोगों के हालात के बारे में बात करना चाह रहा हूं। इतना सुनते ही बिलाल ने कहा क्या बात करूं। मेरी पत्नी, दो बेटियां और बहन बीते एक सप्ताह से घर के सबसे पिछले कमरे में बंद है। डर लगता है तालिबानियों से। खुदा जाने अब हमारे अफगानिस्तान का क्या होने वाला है। सड़कों पर तालिबानी लड़ाके हाथों में बंदूकें लेकर घूम रहे हैं। हम लोग घर से बाहर नहीं निकल सकते हैं। आज सातवां दिन है मेरे घर के दरवाजे और खिड़कियां नहीं खुले हैं। घरों में रखा हुआ पैसा भी खत्म हो गया है और 15 अगस्त के बाद से तो यहां के एटीएम में भी पैसा नहीं निकल रहा है। हालात बहुत बदतर हैं। मैं भारत आना चाहता हूं। मेरे बहुत से रिश्तेदार वहां रहते हैं।
काबुल और आसपास के इलाकों में अमर उजाला डॉट कॉम ने जब फोन पर लोगों से बात की, तो ज्यादातर लोगों ने ऐसे ही बदतर हालात के बारे में जिक्र किया। काबुल शहर के अफरोज इलाके के रहने वाले जफर बिलाल काबुल सिटी सेंटर मॉल में बर्तनों की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। बिलाल कहते हैं हालात तो पिछले कई महीनों से ही बिगड़ने लगे थे। लेकिन इतनी जल्दी इस तरीके के हालात हो जाएंगे, ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था। वे कहते हैं कि जैसे-जैसे इस बात की जानकारी होती जा रही थी कि तालिबानी लड़ाके काबुल की ओर बढ़े चले आ रहे हैं शहर में दहशत का माहौल बनता जा रहा था।