लंदन में रह रहे भगोड़े कारोबारी विजय माल्या को भारत लाने का रास्ता भले ही साफ हो गया है, लेकिन इस केस की सुनवाई के दौरान आरोप-प्रत्यारोपों का जो दौर चला, उसमें कई अहम बातें सामने आई हैं। माल्या की लीगल टीम के सदस्य और राजनीतिक एवं आर्थिक विज्ञानी, प्रोफेसर लॉरेंस सेज ने कोर्ट में कहा, मेरे मव्वकिल विजय माल्या भारत की दो राजनीतिक पार्टियों के बीच फंसे हैं।
दोनों पार्टियां माल्या के केस में एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रही हैं। सेज का आरोप था कि कांग्रेस पार्टी के पूर्व पीएम ने माल्या को लोन दिलाने में मदद की थी। उन्होंने कोर्ट में सीबीआई को 'पिंजरे का तोता' और राजनीतिक लोगों की लड़ाई का 'अखाड़ा' तक कह दिया था।
सोमवार को लंदन कोर्ट ने विजय माल्या के केस की सुनवाई करते हुए उनके प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी थी। लंदन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट में जज एम्मा अर्बथनॉट ने यह फैसला सुनाया है। बता दें कि 62 वर्षीय माल्या पर करीब 9,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और धन शोधन का आरोप है। हालांकि पिछले साल अप्रैल में प्रत्यर्पण वॉरंट पर गिरफ्तारी के बाद से माल्या जमानत पर है।
कोर्ट के फैसले से पहले माल्या ने ट्वीट कर कहा था कि मैंने एक भी पैसे का कर्ज नहीं लिया, कर्ज किंगफिशर एयरलाइंस ने लिया था। बिजनेस में असफलता के कारण पैसा बकाया है। माल्या ने कहा कि मैंने मूल राशि का 100 प्रतिशत लौटने की पेशकश की है। इस फैसले को ब्रिटिश उच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए माल्या के पास 14 दिन का समय है।
विजय माल्या की ओर से अदालत में पेश हुए प्रोफेसर सेज, मॉंटगोमेरी और वॉटसन का कहना था कि सीबीआई की प्रतिष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं। केस की जांच कर रहे सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना का नाम भी अदालत में कई बार लिया गया। प्रोफेसर सेज ने तो उनके चरित्र और प्रोफेशनल इंटीग्रेशन पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
उनका कहना था कि अस्थाना की नियुक्ति पर भी विवाद रहा था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद उनका नाम सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के लिए क्लीयर कर दिया गया। बाद में लंदन कोर्ट ने भी अस्थाना के खिलाफ माल्या के वकीलों द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया था।
पिंजरे का तोता तो अपने मास्टर की बोली बोलेगा...
प्रोफेसर सेज का कहना था कि सीबीआई पिंजरे का तोता है। वह अपने मास्टर की बोली बोलेगा। ऐसे में जांच एजेंसी से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्होंने साफतौर पर कहा, भाजपा के शासनकाल में सीबीआई की स्वतंत्रता पहले के मुकाबले कम हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को लेकर सेज का कहना था कि इस एजेंसी में राजनीतिक हस्तक्षेप होने के ज्यादा सबूत नहीं हैं।