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Aditya L1: सौर भूकंप के अध्ययन पर वैज्ञानिक ने दिया जोर, इससे क्या हो सकता है नुकसान, जानें इस बारे में सबकुछ

Fri, 01 Sep 2023 02:20 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, बंगलूरू।

सार

सूर्य के अध्ययन की आवश्यकता के बारे में बताते हुए भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के प्रोफेसर और प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. आर रमेश ने बताया कि जिस तरह पृथ्वी पर भूकंप आते हैं, उसी तरह सूर्य की सतह पर सौर भूकंप भी आते हैं, जिन्हें कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) कहा जाता है।
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आदित्य-एल1। - फोटो : ISRO
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विस्तार
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चंद्रयान-3 की सफलता के बाद इसरो का सौर मिशन आदित्य-एल1 लॉन्चिंग के लिए तैयार है। भारत के सौर मिशन की लॉन्चिंग से पहले एक शीर्ष वैज्ञानिक ने सुझाव दिया है कि सौर भूकंपों का अध्ययन करने के लिए 24 घंटे के आधार पर सूर्य की निगरानी जरूरी है, क्योंकि यह पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्रों को बदल सकती है। सूर्य का अध्ययन करने के लिए आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान को शनिवार सुबह 11.50 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट  से लॉन्च किया जाएगा।

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'पृथ्वी की तरह सूर्य की सतह पर भी आते हैं भूकंप'
सूर्य के अध्ययन की आवश्यकता के बारे में बताते हुए भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के प्रोफेसर और प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. आर रमेश ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि जिस तरह पृथ्वी पर भूकंप आते हैं, उसी तरह सूर्य की सतह पर सौर भूकंप भी आते हैं, जिन्हें कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) कहा जाता है। उन्होंने कहा, इस प्रक्रिया में लाखों-करोड़ों टन सौर सामग्री को अंतरग्रहीय अंतरिक्ष में फेंक दिया जाता है। उन्होंने आगे कहा, ये सीएमई लगभग 3,000 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से यात्रा कर सकते हैं।

डॉ. रमेश ने बताया, कुछ सीएमई को पृथ्वी की ओर भी निर्देशित किया जा सकता है और सबसे तेज सीएमई लगभग 15 घंटे में पृथ्वी के निकट पहुंच सकता है। यह पूछे जाने पर कि यह मिशन अन्य समान कार्यक्रमों से अलग क्यों है? उन्होंने कहा, ईएसए (यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी) और नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने पहले भी इसी तरह के मिशन लॉन्च किए हैं, लेकिन आदित्य एल1 मिशन दो मुख्य पहलुओं में अद्वितीय होगा क्योंकि हम सौर कोरोना का निरीक्षण उस स्थान से कर सकेंगे जहां से यह लगभग शुरू होता है। इसके अलावा हम सौर वायुमंडल में चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव का भी निरीक्षण कर सकेंगे, जो कोरोनल मास इजेक्शन या सौर भूकंप का कारण है।
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सीएमई से होने वाले खतरे के बारे में दी जानकारी
उन्होंने कहा, कभी-कभी ये सीएमई सैटेलाइट को 'खत्म करके' (निगल जाना) उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। सीएमई से डिस्चार्ज किए गए कण प्रवाह के कारण सैटेलाइट पर मौजूद सभी इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण खराब हो सकते हैं। डॉ. रमेश ने कहा, ये सीएमई सभी तरफ से पृथ्वी तक आते हैं। उदाहरण के लिए, 1989 में जब सौर वायुमंडल में भारी विस्फोट हुआ था, तब कनाडा के क्यूबेक शहर में लगभग 72 घंटे तक बिजली बाधित रही थी; वहीं 2017 में सीएमई की वजह से स्विट्जरलैंड का ज्यूरिख एयरपोर्ट करीब 14 से 15 घंटे तक प्रभावित हुआ था।

डॉ. रमेश ने कहा कि एक बार जब सीएमई पृथ्वी पर पहुंच जाते हैं, तो वे चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ यात्रा कर सकते हैं और फिर वे पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र को बदल सकते हैं और अगर एक बार भू-चुंबकीय क्षेत्र प्रभावित हो जाता है, तो यह ज्यादा वोल्टेज वाले ट्रांसफार्मर को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि सीएमई उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों वाले एक बड़े चुंबक की तरह होते हैं।

उन्होंने बताया, इसलिए सूर्य की लगातार निगरानी के लिए अवलोकन केंद्र स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है, जो लैग्रेंजियन (एल1) बिंदु से संभव है। भारत अपने सैटेलाइट को लैंग्रेंजियन-1 बिंदु पर स्थापित करने के लिए आदित्य-एल1 लॉन्च कर रहा है। रमेश के अनुसार, बेंगलुरु स्थित आईआईए के अधिकारियों ने महसूस किया कि उन्हें 24 घंटे के आधार पर सूर्य की निगरानी करनी चाहिए ताकि सूर्य पर जो भी परिवर्तन हो रहा हो उसका अच्छी तरह से अवलोकन किया जा सके। आईआईए सूर्य का अवलोकन करने वाली लगभग 125 सालों की लंबी परंपरा वाली संस्था है।

डॉ. रमेश ने कहा, सूर्य का अवलोकन जमीन पर स्थित दूरबीन से किया जा सकता है, लेकिन उनकी दो प्रमुख सीमाएं हैं। एक तो यह कि सूर्य की निगरानी के लिए एक दिन में केवल आठ या नौ घंटे ही उपलब्ध होते हैं क्योंकि ऐसे अवलोकन केवल दिन के समय ही किए जा सकते हैं, रात में नहीं। दूसरी चुनौती यह है कि पृथ्वी से सूर्य की निगरानी करते समय सूर्य से आने वाली रोशनी वायुमंडल में धूल के कणों द्वारा बिखर जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप तस्वीर धुंधली हो सकती है। इसलिए सौर अवलोकन में इन कमियों से बचने और आईआईए को सूर्य के 24 घंटे निर्बाध अवलोकन के लिए अंतरिक्ष में एक टेलीस्कोप रखने की आवश्यकता महसूस हुई। यहां पांच सुविधाजनक बिंदु हैं जहां से सूर्य पर नजर रखी जा सकती है। इन्हें लैग्रेंजियन पॉइंट कहा जाता है, जिनका नाम इतालवी खगोलशास्त्री जोसेफ-लुई लैग्रेंज के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इन्हें खोजा था। वैज्ञानिक ने कहा, लैग्रेंज बिंदुओं पर सूर्य और पृथ्वी के बीच आकर्षण का गुरुत्वाकर्षण बल पूरी तरह से संतुलित है।

आईआईए प्रोफेसर ने बताया कि इन सभी पांच बिंदुओं में से सूर्य का निर्बाध दृश्य देखने के लिए एल-1 नामक एक बिंदु है। यह बिंदु पृथ्वी से 15 लाख किमी की दूरी पर सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित है। उनके अनुसार, आदित्य एल-1 अंतरिक्ष मिशन को लैग्रेंजियन-1 बिंदु तक पहुंचने में 100 से अधिक दिन लगेंगे।

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