सूचना के अधिकार अधिनियम में संशोधन की तैयारियों के विरोध में आरटीआई एक्टिविस्ट लामबंद हो गए हैं। उनका कहना है कि आरटीआई एक्ट में संशोधनों के जरिए सरकार इसे कमजोर करना चाहती है। सरकार पहले ही सूचना के अधिकार (संशोधन) विधेयक-2018 को राज्यसभा में पेश करने का आशय पत्र जारी कर चुकी है। आरटीआई एक्टिविस्टों का दावा है कि सरकार ने इस संशोधन के लिए न तो सभी पक्षों से सलाह ली और न ही केंद्रीय सूचना आयोग से संशोधनों को लेकर कोई बातचीत की।
बुधवार को दिल्ली के कांस्टिट्यूशनल क्लब में 'सेव आरटीआई-सेव डेमोक्रोसी' कार्यक्रम में पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने सरकार के इस कदम को प्रतिकूल बताते हुए सूचना आयोग और चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता करने जैसा बताया। उन्होंने कहा कि कानून के जरिए मुख्य सूचना आयुक्त को चुनाव आयोग के बराबर का दर्जा नहीं दिया जा सकता है, जो पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इसका पूरी तरह से खुलासा होना चाहिए कि आरटीआई एक्ट में बदलाव करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है।
एक्ट में संशोधन के विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी उतर आई है, सीपीआई के महासचिव अतुल कुमार अंजान का कहना है कि वे इस अधिनियम में किसी भी संशोधन का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि आरटीआई ने सबसे गरीब और हाशिए पर मौजूद लोगों को ताकत दी है और आरटीआई की वजह से ही लाखों लोग सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, परीक्षा में धोखाधड़ी का पर्दाफाश कर सकते हैं, सरकार की जवाबदेही तय कर सकते हैं।
वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि नीरव मोदी, चोकसी हजारों-करोड़ों रुपए लेकर विदेश भाग हैं, और मोदी सरकार कहती है कि भ्रष्टाचार खत्म हो गया है। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा साफ है कि वे न कोई लोकपाल चाहते हैं, न व्हिसल ब्लोअर को सुरक्षा देना चाहते हैं और अब आरटीआई में संशोधन करके उसे कमजोर करना चाहते हैं। भूषण ने कहा कि सरकार के इन अलोकतांत्रिक संशोधनों का जवाब देश की जनता देगी।
सतर्क नागरिक संगठन और सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) से जुड़ीं अंजलि भारद्वाज के मुताबिक स्वतंत्र रूप से निगरानी रखने वाली संस्थाओं को संवैधानिक संस्था के बराबर लाते हुए ऊंचे कद का दर्जा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सूचना आयुक्तों को संवैधानिक संस्था के बराबर दर्जा इसलिए दिया गया है, ताकि वे स्वतंत्रता और स्वायत्तता के साथ काम कर सकें। सूचना आयुक्तों के पास ये अधिकार होता है कि सबसे बड़े पदों पर बैठे लोगों को भी आदेश दे सकते हैं कि एक्ट के नियमों का पालन करें, लेकिन सरकार संशोधन के जरिए उनका यह अधिकार छीनना चाहती है।
सरकार इस मानसून सत्र में सूचना के अधिकार अधिनियम यानी आरटीआई एक्ट में संशोधन की तैयारी कर रही है। 12 जुलाई को मानसून सत्र के लिए लोकसभा के कार्यदिवसों की जारी सूची में एक बिल सूचना का अधिकार (संशोधन) बिल, 2018 भी है।
गौरतलब है कि सरकार आरटीआई एक्ट में संशोधन कर दो बुनियादी तत्वों को बदलना चाहती है, पहला ये कि सूचना आयोग का कद चुनाव आयोग (ईसी) से कम हो जाए और 5 साल के कार्यकाल में परिवर्तन करना चाहती है। आरटीआई एक्ट के अनुच्छेद 13 और 16 में लिखा है कोई भी सूचना आयुक्त पांच साल के लिए नियुक्त होगा और वो 65 साल की उम्र तक पद पर रहेगा। लेकिन प्रस्तावित संशोधन विधेयक में प्रावधान है कि अब से केंद्र सरकार ये तय करेगी कि केंद्रीय सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त कितने साल के लिए पद पर बने रहेंगे, साथ ही सरकार चुनाव आयोग के मुकाबले सूचना आयोग के आला अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों की समानता को भी सी योजना बना रही है।