50वर्षों में हमारे वैज्ञानिक-इंजीनियरिंग प्रतिभा और स्वदेशी नवाचार ने दुनिया को हतप्रभ कर दिया है। साराभाई के इस संकल्प को साकार करते हुए हमारे वैज्ञानिकों ने प्रक्षेपण यान और सैटेलाइट तकनीक में महारत हासिल की। उसी का नतीजा है कि आज इसरो इन दोनों मोर्चों पर दुनिया में अपनी खास जगह बना चुका है।
आजादी के बाद गांधी के स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की सोच को सही मायनों में हमारे अंतरिक्ष क्षेत्र ने साकार कर दिखाया। 1962 में अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने कहा था, देश को विकास और उन्नत मानव जीवन के लिए स्वदेशी तकनीक बढ़ाने पर जोर देना होगा।
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50वर्षों में हमारे वैज्ञानिक-इंजीनियरिंग प्रतिभा और स्वदेशी नवाचार ने दुनिया को हतप्रभ कर दिया है। साराभाई के इस संकल्प को साकार करते हुए हमारे वैज्ञानिकों ने प्रक्षेपण यान और सैटेलाइट तकनीक में महारत हासिल की। उसी का नतीजा है कि आज इसरो इन दोनों मोर्चों पर दुनिया में अपनी खास जगह बना चुका है। नाज की बात है कि जो विकसित देश हमें अंतरिक्ष तकनीक देने से इनकार करते थे, आज वे हमसे अपने उपग्रह लॉन्च कराते हैं।
जब अमेरिका का नासा 1969 में चांद पर मानव मिशन अपोलो भेज रहा था, तब तक इसरो अस्तित्व में ही नहीं था। लेकिन 50 वर्षों में हमारे वैज्ञानिक-इंजीनियरिंग प्रतिभा और स्वदेशी नवाचार ने दुनिया को हतप्रभ कर दिया है।
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आज इसरो न सिर्फ सबसे कम खर्चीले सैटेलाइट लॉन्च करता है बल्कि चंद्रयान-2 जैसे मिशन से अपने दम पर अंतरिक्ष के अनजाने पहलुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि नासा के मुकाबले इसरो का बजट 14 गुना कम है।
इसरो अब रक्षा सैटेलाइट, कॉमर्शियल लॉन्च सेवा, ग्रहों के मिशन और देश के अंतरिक्ष यात्रियों पर अपना ध्यान लगा रहा है। इनमें चंद्रयान-3 से लेकर 2023 का मानव मिशन गगनयान शामिल है। साथ ही 2030 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्री उतारने की योजना है। पूरी दुनिया हमारे इन स्वर्णिम लम्हों की गवाह बनेगी।