आप आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने से सियासी घमासान तेज हो गया है। आप ने राज्यसभा सभापति से उनकी सदस्यता खत्म करने की मांग की है। पार्टी का आरोप है कि सांसद पद पर बने रहना नियमों के खिलाफ है। ऐसे में अब दल-बदल कानून के तहत आगे की कार्रवाई पर नजर है।
देश की सियासत में एक बार फिर जोरदार सियासी भूचाल आ गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों के अचानक भाजपा में शामिल होने से राजनीतिक तापमान सातवें आसमान पर पहुंच गया है। विपक्षी दल इस घटनाक्रम को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार पर तीखे आरोप लगा रहे हैं। इसी बीच आप ने पलटवार करते हुए बड़ा दांव खेला है। पार्टी नेता संजय सिंह ने साफ किया है कि पार्टी ने राज्यसभा सभापति से इन सातों सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की है।
ऐसे में अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी व्हिप (अनुशासनात्मक आदेश) का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। इसका फैसला संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति करते हैं। हालांकि, इस कानून में एक छूट भी है। अगर किसी पार्टी के कम से कम एक-तिहाई सदस्य मिलकर अलग गुट बना लेते हैं (पहले यह नियम था, अब संशोधन के बाद यह बदल चुका है), या किसी पार्टी का विलय दूसरी पार्टी में हो जाता है, तो उस स्थिति में उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता।
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