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आप का बड़ा एक्शन: भाजपा में गए सात सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग, दल-बदल पर सियासी संग्राम तेज

Sun, 26 Apr 2026 01:40 PM IST
Shubham Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आप आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने से सियासी घमासान तेज हो गया है। आप ने राज्यसभा सभापति से उनकी सदस्यता खत्म करने की मांग की है। पार्टी का आरोप है कि सांसद पद पर बने रहना नियमों के खिलाफ है। ऐसे में अब दल-बदल कानून के तहत आगे की कार्रवाई पर नजर है।

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आम आदमी पार्टी में सियासत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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देश की सियासत में एक बार फिर जोरदार सियासी भूचाल आ गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों के अचानक भाजपा में शामिल होने से राजनीतिक तापमान सातवें आसमान पर पहुंच गया है। विपक्षी दल इस घटनाक्रम को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार पर तीखे आरोप लगा रहे हैं। इसी बीच आप ने पलटवार करते हुए बड़ा दांव खेला है। पार्टी नेता संजय सिंह ने साफ किया है कि पार्टी ने राज्यसभा सभापति से इन सातों सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की है।

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आप का आरोप है कि पार्टी छोड़ने के बावजूद सांसद पद पर बने रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। अब इस सियासी घमासान में अगला कदम क्या होगा, इस पर सबकी नजर टिकी है। पार्टी नेता संजय सिंह ने जानकारी दी कि आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के सभापति को एक याचिका दी है, जिसमें उन सात सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की गई है जिन्होंने पार्टी छोड़ दी है। संजय सिंह ने कहा कि ये सांसद अब पार्टी के साथ नहीं हैं, इसलिए उनकी राज्यसभा सदस्यता भी जारी नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी छोड़ने के बाद भी ये सांसद अपनी सीट पर बने हुए हैं, जो नियमों के खिलाफ है।

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दल-बदल कानून क्या है, इस मामले में लागू होगा?
बता दें कि दल-बदल कानून भारतीय राजनीति का एक ऐसा नियम है जो सांसदों और विधायकों को अपनी पार्टी बदलने से रोकने या उस पर कार्रवाई करने के लिए बनाया गया है। यह कानून 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। इसका मकसद था कि चुने हुए जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में न चले जाएं, क्योंकि इससे जनता के वोट और भरोसे का अपमान माना जाता है।

ऐसे में अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी व्हिप (अनुशासनात्मक आदेश) का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। इसका फैसला संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति करते हैं। हालांकि, इस कानून में एक छूट भी है। अगर किसी पार्टी के कम से कम एक-तिहाई सदस्य मिलकर अलग गुट बना लेते हैं (पहले यह नियम था, अब संशोधन के बाद यह बदल चुका है), या किसी पार्टी का विलय दूसरी पार्टी में हो जाता है, तो उस स्थिति में उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता।

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आम आदमी पार्टी के मामले में लागू होगा?
अब सवाल यह उठता है कि अगर आम आदमी पार्टी के सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, तो क्या उन पर दल-बदल कानून लागू होगा या नहीं। इस बात को ऐसे समझिए कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्होंने किस प्रक्रिया से पार्टी छोड़ी और क्या यह त्याग नियमों के अनुसार सही माना गया या नहीं। अंतिम फैसला राज्यसभा या लोकसभा के सभापति के पास होता है, जो सभी तथ्यों की जांच के बाद तय करते हैं कि सदस्यता खत्म होगी या नहीं।


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