क्या होगा आधार
आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा के दो चुनावों में मिली रिकॉर्ड तोड़ सफलता में उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी लोगों का बड़ा हाथ रहा है। दिल्ली की आबादी में लगभग एक तिहाई प्रतिनिधित्व रखने वाली प्रवासी मजदूरों के सहयोग के बिना आम आदमी पार्टी को यह सफलता हासिल नहीं हो सकती थी।
पार्टी इसे अपने लिए एक मजबूत संकेत के तौर पर देख रही है। उसे लगता है कि इन्हीं प्रवासी मजदूरों के सहारे वह उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में अपने पांव जमा सकती है। प्रवासी मजदूरों की समस्याओं के लिए अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और गोपाल राय की सक्रियता को इससे जोड़कर देखा जा रहा है।
अगर वह देश के इन दो मजबूत राज्यों में पांव जमाने में कामयाब हो जाती है, तो उसके लिए राष्ट्रीय राजनीति की संभावनाएं ज्यादा मजबूत हो जाती हैं। अपने इस वोट बैंक को ज्यादा स्थायित्व देने के लिए ही आम आदमी पार्टी के मुख्य पदों पर इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को दी जा रही जिम्मेदारियों से भी केजरीवाल की सोच का पता चलता है।
खबर है कि पार्टी नगर निगम चुनावों में भी इस क्षेत्र के लोगों को भारी संख्या में टिकट देकर एक अच्छा संकेत देने की कोशिश करने जा रही है। यूपी-बिहार में पार्टी के मजबूत चेहरे संजय सिंह की लगातार सक्रिय उपस्थिति इसी बात के संकेत दे रही है।
दलित-मुस्लिमों के लिए भी पहली पसंद बनकर उभरे
पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली जीतने की पूरी कोशिश की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भी इसमें अपनी पूरी ताकत आजमाई, लेकिन इसके बाद भी वे आम आदमी पार्टी को हराने में कामयाब नहीं हो सके। माना जा रहा है कि इसके पीछे दलितों और मुस्लिमों में आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के प्रति विश्वसनीयता ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
पार्टी नेताओं को लगता है कि अगर दलितों-मुस्लिमों का यही भरोसा अन्य क्षेत्रों में भी जीता जा सके, तो उसकी राह आसान हो सकती है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इन वोटरों की मजबूत दावेदार रही बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के कमजोर होने से यहां पार्टी की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
दिल्ली मॉडल बनेगा राह
अरविंद केजरीवाल बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि देश की जनता को धर्म-संप्रदाय में इसलिए बांट दिया गया, जिससे वह अपने लिए अच्छी सुविधाओं की बात न करे, लेकिन वे उन्हें केवल वही सुविधाएं देना चाहते हैं जिससे वह आज तक वंचित रही है। वे दिल्ली में अच्छे अस्पताल, अच्छे स्कूल और अच्छी शिक्षा का जो मॉडल खड़ा कर रहे हैं, वह राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की पसंद बन सकता है। एक बार उनकी यह सोच कामयाब होने पर उनकी राष्ट्रीय स्तर की सोच कामयाब हो सकती है।
भाजपा का सर्वोच्च 37 फीसदी पर अटका
वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव को भाजपा के सर्वोच्च की तरह से देखा जा रहा है। लेकिन आकंड़ो की हकीकत यही है कि इसके बाद भी 2019 में भाजपा अधिकतम 37.36 फीसदी वोटों पर आकर सिमट गई।
इसके पूर्व 2014 के चुनाव में भाजपा को केवल 31.34 फीसदी वोट मिले थे। यानी उसके उच्चतम स्तर के प्रदर्शन के बाद भी लगभग 65 फीसदी वोट अन्य दलों के पास हैं, जो गैर-भाजपाई विकल्प की तलाश रखते हैं। अरविंद केजरीवाल की निगाह इसी वोट बैंक पर है।
जातीय सोच को तोड़ना होगा मुश्किल
यूपी-बिहार की राजनीति में जातिवाद हावी है। यहां पार्टियों के उम्मीदवारों के चयन के दौरान भी जातीय समीकरणों का पूरा ध्यान रखा जाता है। इन समीकरणों को साधकर ही यूपी-बिहार की राजनीति पिछले 30 वर्षों से कुछ दलों के आसपास ही सिमटी रह गई है। क्या इसे तोड़ना अरविंद केजरीवाल के लिए संभव होगा।
इसका जवाब संजय सिंह इस प्रकार देते हैं कि जब तक दिल्ली की जनता के सामने अच्छे स्कूल, अच्छी शिक्षा और अच्छे अस्पताल का विकल्प नहीं था, तब तक यहां भी उसी प्रकार की राजनीति की जाती थी। लेकिन अरविंद केजरीवाल की स्वच्छ राजनीति ने लोगों को एक विकल्प दिया तो सारा मामला उलट गया।
उन्हें उम्मीद है कि जब इसी तरह का विकल्प यूपी-बिहार के लोगों के सामने मिलेगा, तो वे भी जातीय राजनीति के दुष्चक्र से बाहर आ जाएंगे। उनके इसी कथन में आम आदमी पार्टी की संभावनाएं छिपी हुई हैं।