एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) की लापरवाही के कारण विधवा हुई महिला को सुप्रीम कोर्ट ने न केवल राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा 10 लाख का मुआवजा देने के आदेश को सही ठहराया, बल्कि महिला को ‘वादकर्ता फंड’ में एएआई के जमा 50 हजार रुपये भी देने के लिए कहा है।
जस्टिस अजय रस्तोगी ने विधवा उर्मिला मिश्र की ओर से पेश वकील दुष्यंत पाराशर की उस दलील को स्वीकार कर लिया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 23 के तहत अपीलकर्ता (एएआई) की याचिका खारिज हो गई है, इसलिए उसके द्वारा वादकर्ता फंड में जमा रकम (50,000 रुपये) प्रतिवादी महिला उर्मिला को दी जानी चाहिए।
वास्तव में इस नियम के तहत, अगर राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत ने किसी पर जुर्माना किया हो और वह उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देता है तो उसे जुर्माने की रकम का आधा या 50 हजार रुपये, इनमें से जो भी कम हो उसे वादकर्ता फंड में जमा कराना होता है। अगर उसकी अपील को स्वीकार कर लिया जाता है तो उसे रकम वापस मिल जाती है और याचिका खारिज होने की स्थिति में यह रकम प्रतिवादी को देने या कोर्ट जो उचित समझे, उसे देने की व्यवस्था है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली एएआई की याचिका को खारिज कर दिया था। आयोग ने उर्मिला के पति एनपी मिश्रा के इलाज में बरती गई लापरवाही के कारण उसे पीड़ित पक्ष को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के फैसले को सही करार देते हुए पाया कि उर्मिला के पति एनपी मिश्रा 24 नवंबर, 2012 को त्रिपुरा से दिल्ली जाने वाले विमान में सवार हुए थे।
विमान को कोलकाता होकर जाना था। फ्लाइट में उनकी तबीयत खराब हो गई, जिसके बाद उन्हें कोलकाता एयरपोर्ट पर उतारा गया और डॉक्टरों ने उनकी जांच की। तबीयत बिगड़ने पर एंबुलेंस बुलाने के लिए कहा गया, लेकिन एंबुलेंस को करीब दो घंटे बाद बुलाया गया। उसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया जहां अगले दिन उनकी मौत हो गई। आयोग ने कहा था कि एएआई अगर लापरवाही नहीं बरतता तो उस शख्स की जान बच भी सकती थी।