जीबी रोड पर रहने वाली सेक्स वर्कर अपने बच्चों को दो साल के बाद इस सेंटर पर छोड़ देती हैं। जब कभी बच्चा अपनी मां से मिलने की जिद करता है तो उसे सेंटर कर्मी कोठे पर ले जाकर मां से मिला लाता है। कई बार दोपहर को मां भी पांच-दस मिनट के लिए स्कूल में आकर बच्चे का हालचाल ले जाती है।
कई मौकों पर यह भी देखा गया है कि सेंटर कर्मी बच्चे को लेकर कोठे पर पहुंचता है, लेकिन मां के पास समय नहीं होता। तब तक वह बच्चे को खिलाता-पिलाता है। बच्चा रोने न लगे, इसके लिए वह उसे खिलौने देकर बहलाता है।
ललिता.एस.ए के मुताबिक, वे इन बच्चों को वह सब देने का प्रयास करती हैं, जो एक बच्चे को अपने मां-बाप से मिलता है। बच्चों को उनकी पसंद का खाना देने से लेकर उनके खेलने तक हर बात का ध्यान रखा जाता है। पढ़ाई के साथ संस्कार की अलग क्लास लगती है।
जब ये बच्चे 14 साल के हो जाते हैं तो इनकी मां की सहमति से इन्हें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष पेश कर किसी सरकारी होम में शिफ्ट कर दिया जाता है। वहां पर इन बच्चों को जो भी कोर्स करना है या आगे उन्हें कौन सी पढ़ाई करनी है, इस बाबत सेंटरकर्मी होम में जाकर उनकी मदद करते हैं।
संडे के दिन ये बच्चे जीबी रोड के स्कूल में आते हैं, खेलते हैं, अपनी मां से मिलते हैं और शाम को चले जाते हैं। बच्चों को यही कहा जाता है कि इनकी मां किसी फैक्टरी में काम करती है। वह इनसे मिलने यहीं पर आ जाती हैं। अगर कोई बच्चा दो दिन से ज्यादा स्कूल में अनुपस्थित रहता है तो सेंटरकर्मी कोठे पर जाकर पता लगाते हैं कि बच्चा क्यों नहीं आ रहा है।
इन बच्चों का जब बर्थ-डे होता है तो इनकी मां चुपके से सेंटर पर आकर मिठाई, चॉकलेट, टॉफी और फल दे जाती है। दोपहर को बच्चे का जन्मदिन मनाया जाता है। सभी बच्चे उसे हैपी बर्थ डे टू यू बोलते हैं और तालियां बजाते हैं। अष्ठमी या रामनवमी के दिन स्कूल के बच्चों को, खासतौर पर लड़कियों को कोठों पर बुलाया जाता है। उनकी पूजा कर उन्हें खाना खिलाया जाता है।
एक सवाल के जवाब में कि जीबी रोड या उसके आसपास रहने वाले लोग क्या इन बच्चों को अपने घर बुलाते हैं, तो ललिता का जवाब था, नहीं, बिल्कुल नहीं। यहां पर बड़े-बड़े कारोबारी हैं, मगर नवरात्र पर वे इस स्कूल के बच्चों को बुलाना पसंद नहीं करते।
कोठे नंबर 52 में रह रही शयामली (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हमारी जैसे तैसे कट गई, लेकिन बच्चों को इस नर्क से दूर रखना है। हमारा प्रयास यही रहता है कि दसवीं के बाद इन्हें अपने गांव या शहर में या फिर कहीं दूर हॉस्टल में भेज दिया जाए।