करीब एक दशक से लड़ाई लड़ रहे मराठा समुदाय के लिए आज खुशी का दिन है। कई जान गंवाने के बाद आज इस समुदाय को जरूर राहत मिली है। दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने रविवार को एसईबीसी में मराठा समुदाय को स्वतंत्र आरक्षण देने का रास्ता साफ कर दिया है। महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि हमें पिछड़ा वर्ग आयोग की तीन सिफारिशें एक साथ मिली थीं। जिसपर विचार के बाद मराठा समुदाय को स्वतंत्र आरक्षण देने का फैसला लिया गया है। फडणवीस ने कहा कि हमने सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। और उन्हें लागू करने के लिए वैधानिक कदम उठाने के लिए एक कैबिनेट उप-समीति गठित की है। जानिए एक दशक पहले शुरू हुए इस मराठा आंदोलन की पूरी कहानी...
बता दें कि महाराष्ट्र की राजनीति में खासा प्रभाव रखने वाले मराठा समुदाय ने करीब एक दशक तक आरक्षण के लिए संघर्ष किया है। दो साल पहले मूक मोर्चा निकाल कर सरकार तक अपनी बात पहुंचाने वाले मराठा समुदाय ने इस बार भी आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया था।
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन की आग में मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई और महाराष्ट्र के कई अन्य इलाकों में आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए थे। प्रदर्शनकारियों के पथराव में एक सिपाही की भी मौत हो गई थी।
ये हैं मराठा आरक्षण आंदोलन की असली वजह
मराठा किसान रैली
मराठा समुदाय अपेक्षाकृत तौर पर संपन्न लगता है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि उन्हें आरक्षण की जरूरत क्यों महसूस हुई? महाराष्ट्र के बाहर लोगों को यह मांग चौंकाने वाली और राजनीति से प्रेरित लग सकती है। लेकिन इसके पीछे मुख्य वजह मराठा समुदाय का असंतुलित विकास है।
साल 1990 के बाद ग्लोबलाइजेशन का दौर आया। इस दौर में खेती के समस्याएं और उसके सवाल बहुत उग्र रूप में सामने आए। महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की आबादी लगभग 30 फीसदी है यानी करीब 4 करोड़ लोग। आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 90 से 95 फीसदी लोग भूमिहीन किसान हैं। वे असिंचित भूमि पर खेती करते हैं और उनका दैनिक जीवन बहुत दर्दनाक है। ये भूमिहीन किसान भयंकर गरीबी की मार झेल रहे हैं।
खेती का सवाल मराठा समुदाय के लिए जीने मरने का प्रश्न बन गया है। महाराष्ट्र में खुदकुशी करने वाले किसानों में से 90 फीसदी मराठा समुदाय से हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि आत्महत्या की घटनाओं को सभी किसानों की आत्महत्या बताते हैं। यह कोई नहीं कहता कि मराठा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि व्यवसाय से जुड़े कई मराठा किसान खेती में नुकसान, फसलों के दाम में कमी और ब्याज के बढ़ते बोझ के चलते मौत को गले लगा चुके हैं।
मराठा समुदाय का एक छोटा तबका ही सत्ता और समाज में ऊंची पैठ रखता है। मराठों की शिकायत है कि सत्ता में मराठा हो या गैर मराठा, समुदाय के प्रश्नों और समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं देता। समाज का बड़ा तबका शैक्षिक और आर्थिक रूप से अब तक पिछड़ा है। समुदाय के अधिकतर लोग अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर पाते। पढ़ाई के लिए खेत गिरवी रखना या कर्ज लेना आम है।
ज्यादातर आंदोलनकारी असमान विकास से प्रभावित हैं। मराठा समुदाय की शिकायत है कि चूंकि वे सामान्य वर्ग में शामिल हैं इसलिए उन्हें नौकरी भी नहीं मिलती। नौकरशाही में आईएएस, आईपीएस की नौकरियों में भी मराठा समुदाय के लोगों की मौजूदगी न के बराबर है। न्यायिक सेवा हो या कॉरपोर्ट क्षेत्र वहां भी मराठा समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य है। मराठा समुदाय के आंदोलकारी मानते हैं कि कुछ नेताओं के मंत्री और मुख्यमंत्री बन जाने से समुदाय समृद्ध नहीं हो जाता। कृषि क्षेत्र में संकट ने मराठा असंतोष की पृष्ठभूमि तैयार की है।
क्यों उग्र हो गया था मराठा आंदोलन
maratha reservation
जुलाई अगस्त में मराठा आंदोलन ने अचानक तेजी पकड़ ली थी और उग्र रूप धारण कर लिया था। इसके पीछे की वजह प्रदेश सरकार का वह एलान था जिसमें कहा गया था कि राज्य में जल्द ही 72 हजार सरकारी नौकरियों की घोषणा हो सकती है। मराठा समुदाय चाहता है कि इस भर्ती अभियान के पहले उनको आरक्षण मिल जाना चाहिए ताकि उनके समुदाय को किसी प्रकार का नुकसान ना हो।
एक दशक पुराना है मराठा आंदोलन
मराठा आंदोलन की शुरुआत करीब एक दशक पहले हो चुकी थी। समुदाय के लिए आरक्षण की मांग भी करीब 10 वर्षों से हो रही है। साल 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार ने मराठा समुदाय को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों मे 16 फीसदी आरक्षण दिया था।
लेकिन हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि कुल आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती और इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि मराठा समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार है। कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग से मराठा समाज की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है, जिसके बाद ही मराठा आरक्षण पर कोई फैसला संभव है।
इसलिए बढ़ी थीं राज्य सरकार की मुश्किलें
देवेंद्र फडनवीस से मिलते प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधि (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए यह परेशान करने वाला घटनाक्रम था। क्योंकि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से है। ब्राह्मण महाराष्ट्र की जनसंख्या में सिर्फ तीन से साढ़े तीन फीसदी हैं। वहीं राज्य में मराठों की आबादी लगभग 30 फीसदी है। इतनी बड़ी आबादी को नाराज कर सत्ता में बने रह पाना या अगले साल होने वाले चुनाव में दोबारा सत्ता पर काबिज होना भाजपा सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता था।
वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमारेखा तय कर रखी है। जिसके पार जाकर मराठों को आरक्षण देना भी संभव नहीं है। ओबीसी के लिए निर्धारित 27 फीसदी कोटे में ही मराठों को शामिल करने का जोखिम अगर सरकार उठाती तो उस स्थिति में एक अलग ओबीसी आंदोलन शुरू हो सकता है। ओबीसी वर्ग आरक्षण में किसी तरह के बदलाव के खिलाफ है।