अश्विन दलित परिवार से हैं और वह राजमिस्री के तौर पर अपना जीवन जी रहे हैं। हालांकि उन्होंने संस्कृत में एमए किया है मगर इसके बावजूद अश्विन को नौकरी नहीं मिली और वह राजमिस्री बन गए। गुजरात के विजयपुर तालुका के दगावाड़िया गांव में 99 प्रतिशत साक्षरता दर है। यह गुजरात की औसल साक्षरता 79.37 से अधिक है, लेकिन नौकरियां ज्यादा नहीं हैं।
तीन साल पहले ओबीसी चौधरी समुदाय और दलित समुदाय के दो लड़कों के बीच झगड़ा हो गया था। जिसकी वजह से गांव में पथराव और तनाव बढ़ गया था। गांव में रहने वाले 35 दलित परिवारों को जो पारंपरिक रूप से मृत पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करते थे उनको गांव छोड़ने की धमकी दी गई। हालांकि बाद में दलित समुदाय के इन लोगों ने मेहसाणा कोर्ट में हर सुनवाई पर जाने के लिए वाहन का खर्च न उठा पाने की वजह से चौधरियों से समझौता कर लिया।
दगावाड़िया गांव के दलित काफी सहमे रहते हैं। उना में गाय की चमड़ी उतारने पर गौ-गौरक्षकों द्वारा की गई दलितों की पिटाई का भी यहां असर पड़ता है। अगर गांव के बाहर कोई घटना होती है तो इसका असर दलितों पर भी होता है। अश्निन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि,'दलितों पर गाय की हत्या का आरोप लगया गया और गौ-रक्षकों ने दलितों की पिटाई का वीडियो व्हाट्सएप पर फैला दिया। जैसे कोई जंग जीत गए हों।'
दगावाड़िया में उना कांड का अपना असर है
- फोटो : Express Photo by Javed Raja
साक्षरता दर ज्यादा होने के बावजूद दगावाड़िया में उना कांड का अपना असर है। नवरात्रि त्यौहार के समय यहां पर तीन प्रकार के गरबा का आयोजन किया गया। ऊंची जात वालों और ओबीसी ने एक गरबा का आयोजन किया और दलितों ने दो गरबा का आयोजन किया।
विजयपुर के राज्सव अधिकारी डीबी टेंक जिन्होंने 2013 में क्षेत्र में तनाव को शांत करने के लिए हस्तक्षेप किया था। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा,'मुख्य मुद्दा दलितों को दुकान से सामान नहीं देने और आटा चक्की से आटा नहीं देने के अलावा मंदिरों में दलितों के जाने पर पाबंदी लगाने का था। मैं वहां पुलिस और सामाजिक कल्याण विभाग के अधिकारियों के साथ गया। सेनमास, चौधरी और दलित साथ में महादेवन और काली माता मंदिर गए। फिर उसके बाद सबकुछ ठीक हो गया।'
अश्विन हालांकि इस 'समझौते' को लेकर काफी उदासीन हैं। वह कहते हैं,'आप सारी जिंदगी भूखे रहें और एक दिन आपको कोई खाना दे। यह सिर्फ कागजों पर दिखाने के लिए है।' अश्विन के मुतबाकि,'यह मामला सिर्फ मंदिर में जाने का नहीं है बल्कि नौकरियों का है और सच तो यह है कि लोगों के पास अपनी जमीन नहीं है। मुझे भी राजमिस्री का काम सिर्फ इसिलए करना पड़ा क्योंकि कई इंटरव्यू देने के बाद भी मुझे नौकरी नहीं मिली।'