पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत के समर्थक के रूप में नूपुर शर्मा और मोहम्मद जुबैर के बीच स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण व्यवहार को देखना बहुत परेशान करने वाला है। पूर्व नौकरशाहों ने 15 जुलाई को ये पत्र लिखा था।
72 पूर्व सिविल सेवकों ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने वाले लोगों की जांच करने को कहा है। इसमें उन्होंने कहा कि आप सरकार को सलाह दें कि वह पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करे कि वे अपने बोलने की आजादी के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों के खिलाफ किसी भी तरह की विच हंट को रोकें और सुनिश्चित करें कि भविष्य में कोई भी आधारहीन मामला दर्ज नहीं किया जाए। इस पत्र में पूर्व नौकरशाहों ने ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर की व्यक्तिगत नागरिक स्वतंत्रता के निरंतर हनन पर प्रकाश डाला।
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पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत के समर्थक के रूप में नूपुर शर्मा और मोहम्मद जुबैर के बीच स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण व्यवहार को देखना बहुत परेशान करने वाला है। पूर्व नौकरशाहों ने 15 जुलाई को ये पत्र लिखा था। शनिवार को इसे सार्वजनिक किया गया।
पत्र में उन्होंने लिखा कि हम आपसे अपील करते हैं कि आप सरकार को सलाह दें कि वह पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी करे कि वे अपने बोलने की आजादी के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों के खिलाफ किसी भी तरह की विच हंट को रोकें और सुनिश्चित करें कि भविष्य में कोई भी आधारहीन मामला दर्ज नहीं किया जाए। साथ ही सरकारी अधिवक्ताओं को नियमित रूप से जमानत के लिए आवेदनों का विरोध न करने का निर्देश दिया जाए।
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गौरतलब है कि दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को जुबैर को 2018 में एक हिंदू देवता पर उनके कथित आपत्तिजनक ट्वीट से संबंधित एक मामले में जमानत दे दी थी। इस ट्वीट में उन्होंने कहा था कि 'स्वस्थ लोकतंत्र के लिए असंतोष की आवाज आवश्यक है।' हालांकि अभी जुबैर को जेल में ही रहना होगा क्योंकि उसे उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा धार्मिक भावनाओं को आहत करने के मामले में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह और पूर्व स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव शामिल हैं। पत्र में सुप्रीम कोर्ट का भी हवाला दिया गया है। जिसमें शीर्ष अदालत ने हाल के एक फैसले में कहा है कि लोगों को अंधाधुंध गिरफ्तार करना और उन्हें जेल में डालना भारत को एक पुलिस राज्य बना रहा है।