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आजादी के 70 साल: राजनीति में इंदिरा इज इंडिया की कहानी

Tue, 15 Aug 2017 06:51 AM IST
amarujala.com, Written By: श्रवण शुक्ला
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इंदिरा गांधी
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भारत देश को आजाद हुए 70 साल हो चुके हैं। ये देश और इसकी आवाम तमाम बदलावों की गवाह रही है। भारत देश के लोकतंत्र से पूरी दुनिया सीख लेती है। माना कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश के तौर पर हमें नहीं जाना जाता, पर हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के तौर पर अपनी पहचान रखते हैं। इस देश में लोकतंत्र के साथ ही वंशवाद भी रहा। इसी वंशवाद में सबसे पहला नाम आता है, देश के ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का। उनकी पुत्री के तौर पर इंदिरा 'प्रियदर्शनी' गांधी का नाम देश के बड़े नेताओं में बेहद सम्मानपूर्वक लिया जाता है। भले ही लोकतंत्र के कलंक के तौर पर आपातकाल थोपना उनकी सबसे बड़ी गलती रही हो। पर उससे पहले इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाने के लिए भारत देश की राजनीतिक चौसर पर सबसे बड़ा दांव अगर किसी के लिए खेला गया, तो वो इंदिरा गांधी थी। 
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इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ के कामराज ने बड़ा दांव खेला। उन्होंने बड़े बड़े कांग्रेसी नेताओं, जो उस समय केंद्र में मंत्री थे या फिर अपने राज्यों में मुख्यमंत्री। उन्हें पद से हटने को कहकर जनता के बीच भेज दिया और कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में 1959 उन्हें चुन लिया गया। ये पहला मौका था, जब इंदिरा गांधी को भविष्य के राजनेता के तौर पर सामने लाया गया। हालांकि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी वानर सेना बनाई थी और सेनानियों के साथ काम किया था।

विरासत में मिली राजनीति और तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आसमयिक मौत ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा दिया, कांग्रेस के अंदरखाने विरोध के बावजूद। हालांकि उन्हें शुरू में गूंगी गुड़िया की उपाधि दी गई। नेहरू के निधन के बाद ही वो पहली बार चुनाव लड़ी थी और लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में वो सूचना एवं प्रसारण मंत्री रही थी। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया ने उनका एक अलग रूप देखा। वो 1966 से 1977 तक लगातार प्रधानमंत्री रहीं, इस दौरान भारत देश ने अपने कट्टर दुश्मन पाकिस्तान को न सिर्फ पराजित किया, बल्कि पाकिस्तान के टुकड़े भी उन्होंने कर दिए। इस बीच इमरजेंसी ने उनकी साख में जरूर बट्टा लगाया, पर पाकिस्तान पर विजय पाकर उन्हें दुर्गा की न सिर्फ उपाधि दी गई, बल्कि उन्होंने दुनिया के रहनुमा कहे जाने वाले पश्चिमी देशों के राजनेताओं को उनकी सही जगह बताने के साथ ही भारत की मतबूती भी दिखाई।
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इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए आणविक विस्फोट तक किए। सभी यह मानते हैं कि वे कभी फैसले लेने में पीछे नहीं रहती थीं। जनता की नब्ज समझने की उनमें विलक्षण क्षमता थी। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना, बांग्लादेश के गठन में मदद देना और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को राजनयिक दांव-पेंच में मात देने जैसे कदम उठाए, जो साबित करता है कि इंदिरा गांधी ऐसे तमाम राजनेताओं की सोच से बाहर की व्यक्तित्व थी, जिन्होंने शुरूआत में उन्हें कामराज की कठपुतली और गूंगी गुड़िया जैसे नाम दिए थे।

इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को ही नहीं, देश में अपने विरोधियों को भी निर्णायक मात दी। गरीबी हटाओ का उनका नारा मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला। अगले कुछ साल उपलब्धियों के रहे और 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट करके उन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया। दक्षिण एशिया में इंदिरा के नेतृत्व में एक ऐसी शक्ति का उदय हुआ था जिसकी ओर कोई आंख उठाकर नहीं देख सकता था। इंदिरा देशभक्ति का पर्याय बन गईं। हालांकि साल 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके निर्वाचन को रट्ट कर दिया। जिसके बाद लगा था कि इंदिरा की सत्ता चली जाएगी। पर आयरन लेडी कहलाने वाली इंदिरा ने देश पर इमरजेंसी थोप दी। उस दौरान इंदिरा कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने 'इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा' का नारा दिया। 

गूंगी गुड़िया से 9 सालों के भीतर ही खुद को इंडिया कहलाने का उनका खुद का गर्वित समय जब आ गया, तो इमरजेंसी के दौरान उन्होंने देश को सुधारने के लिए चाबुक उठा लिया। हालांकि ये इमरजेंसी का गुणगान नहीं है। पर ये वो समय था, जब इंदिरा की तरफ से जमीनी विकास के लिए 20 सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा हुई। रेलें समय से चलने लगीं। दफ्तरों में काम होता नजर आने लगा। सरकारी बाबुओं की सुस्ती दूर हुई। पर आम लोगों की नजर में देश को सुधारने का इंदिरा का कोड़ा रास नहीं आया। आम लोगों के लिए इमरजेंसी का मतलब था संजय के नेतृत्व में खड़ी यूथ कांग्रेस का उत्पात, अंधाधुंध नसबंदी अभियान और फर्जी मुठभेड़ों से भरा पुलिसिया राज। जोकि व्यापक स्तर पर सच साबित हुआ। इमरजेंसी में विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के बाद चुनाव करवाए, तबतक लगा था कि वो चुनाव आसानी से जीत जाएंगी। पर इंदिरा को बड़ी हार झेलनी पड़ी। इंदिरा खुद रायबरेली से चुनाव हार गईं जिसके बारे में उनके विरोधियों को भी भरोसा नहीं था। ये हमारे देश के लोकतंत्र की जीत थी। इंदिरा को पदमुक्त हुए अभी 3 साल ही होने को थे, कि देश फिर से चुनाव के मुहाने पर आ खड़ा हुआ। इंदिरा को हराकर सत्ता में आए बड़े नेता आपसी लड़ाई में इंदिरा के आगे ढेर हो गए। साल 1980 के चुनाव में फिर से इंदिरा पर जनता ने भरोसा जताया। और वो प्रधानमंत्री बनीं।

ये इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व की कठोरता और देश के प्रति निष्ठा ही थी कि उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे कदम उठाए। हालांकि उस निर्णय की वजह से पंजाब एक बार फिर से खूनी खेलों की धरती बन गया था। उन्होंने उससे पहले आपातकाल जैसा कदम उठाया था, पर इसके बावजूद 1980 में देश की जनता उन्हें फिर से जनादेश दिया था। इस जनादेश को सार्थक साबित करने के लिए ही उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसा कदम उठाया था। इंदिरा गांधी ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद से सिख अलगाववादियों के निशाने पर थीं। 31 अक्टूबर 1984 को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी। गरीबी मुक्त भारत इंदिरा का एक सपना था। जो आज भी साकार नहीं हो पाया है।
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