देश में सांविधानिक संस्थाओं की साख और उनकी स्वायत्तता को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। इसी बीच 42 पूर्व जजों और सेवानिवृत्त सांविधानिक अधिकारियों ने भारत के नागरिकों के नाम एक खुला पत्र लिखा। जजों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी राजनीतिक दल के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन आज के दौर में साधे रखी गई चुप्पी निष्पक्षता नहीं हो सकती। उनका मानना है कि जब देश की बुनियादी संस्थाओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा हो, तब सामने आकर सच बोलना बेहद जरूरी हो जाता है।
पूर्व जजों ने क्या चेतावनी दी?
पूर्व जजों ने साफ चेतावनी दी है कि जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है। अगर नागरिकों को लगातार यह समझाया जाएगा कि उनके वोट का कोई मोल नहीं है, तो वे मतदान व्यवस्था पर भरोसा करना छोड़ देंगे। जब मतपेटी अपनी अहमियत खो देती है, तब सड़कों पर अराजकता शुरू हो जाती है। कुछ अराजक और सीमांत तत्व इस खाली जगह का फायदा उठाते हैं, जिनमें से कुछ देश के भीतर से और कुछ सीमाओं के पार से निर्देश लेते हैं।
राजनीतिक दलो और मीडिया को क्या सलाह दी?
संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी साझी है। सांविधानिक संस्थाएं जनता के भरोसे और पूर्ण पारदर्शिता से अपनी साख बनाती हैं। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपनी शिकायतें कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही उठाएं। वहीं मीडिया को भी कल्पना और सत्यापित तथ्यों के बीच का अंतर जनता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाना चाहिए। किसी भी लोकतंत्र में जनता का विश्वास ही शासन की वास्तविक रीढ़ होता है।
सांविधानिक संस्थाओं पर क्या बोले?
सांविधानिक संस्थाएं किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे भारत के 140 करोड़ नागरिकों की हैं। इनकी विश्वसनीयता पर हमला सीधे तौर पर उन संस्थाओं पर हमला है जो नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करती हैं। अंत में सभी 42 पूर्व जजों ने देश के हर नागरिक से संविधान और इन लोकतांत्रिक संस्थाओं के बचाव में मजबूती से खड़े होने का आह्वान किया है।