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गिद्धों के लिए दवा ही बनी जहर, चार करोड़ से घटकर रह गए महज 4 लाख

Mon, 10 Feb 2020 11:03 PM IST
आसिम खान पीटीआई, नई दिल्ली
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सांकेतिक तस्वीर
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अगर यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब भारत में गिद्धों की सिर्फ कहानियां ही सुनने को मिलेंगी। पिछले तीन दशक में इस पक्षी की संख्या इतनी ज्यादा गिर चुकी है कि यह लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सोमवार को चिंताजनक आंकड़े पेश करते हुए बताया कि गिद्धों की संख्या तीन दशक में चार करोड़ से घटकर चार लाख से भी कम रह गई है।

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संयुक्त राष्ट्र द्वारा वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण (सीएमपी) कार्यक्रम के आयोजन को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘डाइक्लोफेनेक’ की वजह से गिद्धों की मौत हुई क्योंकि वे मृत जानवरों को खाते हैं। उन्होंने बताया कि ‘डाइक्लोफेनेक’ उनकी मांसपेशियों में जमा हो जाती है। जब पशुओं की मौत होती है तो गिद्ध उन्हें खाते हैं और फिर यह दवा गिद्धों के शरीर में पहुंचकर उनकी मौत का कारण बन जाती है।

सरकार के दावे को विशेषज्ञों ने किया खारिज : 

गिद्धों की आबादी बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए पर्यावरण मंत्रालय में वन महानिरीक्षक (वन्य जीव) सौमित्र दासगुप्ता ने बताया कि इस दवा को प्रतिबंधित किया गया है और अब गिद्धों की आबादी बढ़ रही है।

मंत्रालय के दावे पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा कि दवा को अब भी प्रतिबंधित किया जाना बाकी है जबकि एक विशेषज्ञ ने कहा कि इस प्रतिबंध को लागू करने में खामियां है। पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता गौरव बंसल ने कहा कि यह सच है कि डाइक्लोफेनेक गिद्धों के मरने का मुख्य कारण है लेकिन इसे अब तक प्रतिबंधित नहीं किया गया है। इस दवा को केवल तमिलनाडु में प्रतिबंधित किया गया है, पूरे देश में नहीं, जो चिंता का विषय है। वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्सूएफ) के पर्यावरणविद दीपांकर घोष ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम इसका इस्तेमाल हो रहा है।

15 से 22 फरवरी को गुजरात में सम्मेलन 

यहां आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जावेड़कर ने बताया कि सीओपी-13 सम्मेलन 15 से 22 फरवरी के बीच गुजरात में होगा और यह वन्यजीव संरक्षण में एक सार्थक कदम है। सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 फरवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए करेंगे।

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