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चिंता: 3722 प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा; जलवायु परिवर्तन से सरीसृप-पक्षी और स्तनधारी जीव भी संकट में

Tue, 02 Jul 2024 05:53 AM IST
शिव शरण शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

शोधकर्ताओं ने कुल 34,035 प्रजातियों पर अध्ययन किया। इनमें से 10 फीसदी प्राकृतिक आपदा के कारण खतरे में हैं। जबकि 5.4 फीसदी प्रजातियों पर उच्च जोखिम मंडरा रहा है। खतरे में पड़ी इन प्रजातियों में पक्षियों की 5.7, स्तनधारियों की 7, उभयचरों की 16 और सरीसृपों की 14.5 फीसदी प्रजातियां शामिल हैं।
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जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ani
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जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया की 3,722 प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इनमें सरीसृप, उभयचर, पक्षी और स्तनधारी जीव भी शामिल हैं। यह प्रजातियां ऐसे क्षेत्रों में रहती हैं, जहां तूफान, भूकंप, सुनामी और ज्वालामुखी जैसी आपदाओं के आने का सबसे ज्यादा खतरा है। कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के ग्लोब इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ताओं ने ताजा अध्ययन में इसका खुलासा किया है। अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है। 

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शोधकर्ताओं ने कुल 34,035 प्रजातियों पर अध्ययन किया। इनमें से 10 फीसदी प्राकृतिक आपदा के कारण खतरे में हैं। जबकि 5.4 फीसदी प्रजातियों पर उच्च जोखिम मंडरा रहा है। खतरे में पड़ी इन प्रजातियों में पक्षियों की 5.7, स्तनधारियों की 7, उभयचरों की 16 और सरीसृपों की 14.5 फीसदी प्रजातियां शामिल हैं। इनमें से 2,001 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन पर इन आपदाओं का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। शोध के मुताबिक इनमें से 834 सरीसृप, 617 उभयचर, 302 पक्षी और 248 स्तनधारी प्रजातियां भारी खतरे में हैं। यह प्रजातियां मुख्य रूप से द्वीपों और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

983 प्रजातियों पर तूफान का कहर
आपदाओं के लिहाज से जहां तूफानों की वजह से 983 प्रजातियों का अस्तित्व संकट में है, वहीं भूकंपों के कारण 868, सुनामी 272 और ज्वालामुखी की वजह से 171 प्रजातियां प्रभावित हुई हैं। इसके अलावा लगभग 400 ऐसी प्रजातियों की भी पहचान की गई है, जो मानवीय हस्तक्षेप के कारण विलुप्ति के कगार पर हैं।
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पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा गहरा असर
शोधकर्ताओं का कहना है कि इतनी भारी मात्रा में प्रजातियों के विलुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर पड़ेगा। देखा जाए तो पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू जैसे परागण, बीजों को फैलाना यह सभी जीवित जीवों के बीच होने वाली परस्पर क्रियाओं पर निर्भर है। ऐसे में इन परस्पर क्रियाओं में तालमेल के बिगड़ने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसकी वजह से न केवल प्रजातियों में तेजी से गिरावट आएगी बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों को भी नुकसान पहुंचेगा।

इंसानी हस्तक्षेप कम करना होगा...
अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता जोनास गेल्डमैन और बो डाल्सगार्ड का कहना है कि इनमें से आधी प्रजातियां प्राकृतिक आपदाओं के कारण विलुप्त होने के उच्च जोखिम से जूझ रही हैं। इनमें से कई प्रजातियां उष्णकटिबंधीय द्वीपों पर पाई जाती हैं, जहां इंसान पहले ही कई प्रजातियों के विलुप्त होने की वजह बन चुके हैं। यदि इन प्रजातियों को बचाना है तो उनके क्षेत्र में इंसानी हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन भी मानवीय कारगुजारी का परिणाम है।

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