हत्या के मामले में 37 वर्षों से उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति ने यह कहते हुए
सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है कि घटना के वक्त वह
नाबालिग था। इस आधार पर उसने दोष सिद्धि के फैसले को दरकिनार करने की गुहार लगाई है। अपने बचाव में स्कूल परित्याग प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि को आधार बनाते हुए पांचवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ चुके 56 वर्षीय विजय पाल ने सुप्रीम कोर्ट से दोषी ठहराए जाने वाले आदेश को दरकिनार करने की गुहार की है। न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने इस मामले का परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। पीठ ने राज्य सरकार को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक स्कूल के प्रधानाध्यापक द्वारा जारी स्कूल परित्याग प्रमाणपत्र के मुताबिक, घटना के वक्त विजय पाल 16 वर्ष 11 महीने का था। घटना 11 जून, 1979 की है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत आरोपी ट्रायल के दौरान ही नहीं, बल्कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी अपने नाबालिग होने को मसला उठा सकता है। 37 वर्ष जेल में बिताने के बाद विजय पाल ने इसी प्रावधान का हवाला देते हुए फतेहपुर जेल अधीक्षक के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के एडिशनल रजिस्ट्रार को पत्र लिखा था।