केंद्र सरकार अगले पांच वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर 3.25 लाख करोड़ रुपये (करीब 47.4 अरब डॉलर) जुटाने की तैयारी में है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ उपक्रमों (सीपीएसई) में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 40 फीसदी तक ला सकती है। सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि दो दशक से अधिक समय में यह देश का सबसे बड़ा निजीकरण हो सकता है।
पिछले सप्ताह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए बजट पेश करते हुए कहा था कि सरकार कुछ सीपीएसई में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 51 फीसदी से नीचे लाने पर विचार करेगी। इस पर मामला दर मामला विचार होगा। सीतारमण ने कहा कि सरकार ने कुछ सीपीएसई में 51 फीसदी तक हिस्सेदारी रखने की नीति में संशोधन करने का फैसला किया है। इनमें सरकारी संस्थान भी शामिल हैं।
इस योजना से सरकारी कंपनियों में अधिक-से-अधिक निजी निवेश होगा। साथ ही इस प्रकार के वार्षिक विनिवेश राजस्व को लक्षित किया जाएगा, जो राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण होगा। मोदी सरकार पांच साल के अपने पहले कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर 40.92 अरब डॉलर की राशि जुटा चुकी है। यह राशि यूपीए सरकार की ओर से 2009-14 के बीच किए गए 14.52 अरब डॉलर के विनिवेश से करीब तीन गुनी अधिक है।
इन कंपनियों में हिस्सा बेच सकता है केंद्र
सूत्रों के मुताबिक, सरकार जिन सीपीएसई में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रही है, उनकी पहचान कर ली गई है। सार्वजनिक क्षेत्र की इन कंपनियों में ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, गेल इंडिया लिमिटेड, एनएचपीसी लिमिटेड, एनटीपीसी, एनएमडीसी लिमिटेड, कोल इंडिया, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इन कंपनियों के नाम अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।