देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' की 18वीं बटालियन के सिपाही 'बोधनाथ मिश्रा', जो 1991 में सेवा में आए थे और 1997 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया, पिछले 27 वर्षों से न्याय के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय से लेकर सीआरपीएफ डीजी सहित विभिन्न लोगों को, उन्होंने करीब तीन सौ पत्र लिखे कि उनके केस की नए तथ्यों के साथ जांच की जाए। उन्हें बहाल किया जाए, मगर कहीं पर भी बात नहीं बन सकी। गत वर्ष सीआरपीएफ के डीजी अनीश दयाल को लिखा तो उन्होंने भी पिछली कार्रवाई को आधार बताकर कोई राहत नहीं दी। तकरीबन हर जगह पर उनका पिछला रिकॉर्ड देखकर ही बर्खास्तगी को ठीक करार दिया जाता रहा।
मौजूदा डीजी जीपी सिंह से जब बोधनाथ मिश्रा ने अपने केस का हवाला देते हुए मुलाकात का समय मांगा तो डीजी, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत के लिए तैयार हो गए। 27 वर्ष में जीपी सिंह ऐसे पहले डीजी हैं, जिन्होंने पूर्व सिपाही की बात सुनी, लेकिन इसके बावजूद मिश्रा की न तो बहाली हुई, न दोबारा जांच का आदेश हुआ और न ही फंड मिल सका। बल मुख्यालय की तरफ से मिश्रा को लिखा गया कि वे जीपीएफ, रिस्क फंड व दूसरे भत्ते लेने की प्रक्रिया शुरु कर सकते हैं। मिश्रा का कहना है कि 27 साल बाद उसे बिना ब्याज के भत्ते दिए जा रहे हैं। यह सरासर अन्याय है। मिश्रा की मांग है कि उनके केस की नए तथ्यों के साथ दोबारा से जांच कराई जाए। इन सबके पहले उसे बहाल किया जाए।
बता दें कि बोधनाथ मिश्रा 1991 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। वे बल की 18वीं बटालियन में तैनात थे। वर्ष 1995 तक सब ठीक चलता रहा। तीन साल तक वे जम्मू कश्मीर में भी तैनात रहे थे। श्रीनगर स्थित जेल ड्यूटी के दौरान एक ग्रेनेड हमले में वे घायल भी हुए थे। बोधनाथ मिश्रा के मुताबिक, डॉक्टर ने उन्हें होम रेस्ट दिया, लेकिन तत्कालीन कमांडेंट ने कहा, हम घर नहीं जाने देंगे। यहीं आराम करो। मिश्रा के घर से टेलीग्राम आया कि नवजात शिशु गंभीर अवस्था में है। मानसिक तनाव के कारण मां अस्पताल में भर्ती है। होम रेस्ट न दिए जाने के कारण उन्होंने 4 मार्च 1996 को कैंप में हंगामा कर दिया। नतीजा, उन्हें क्वार्टर गार्ड में बंद कर दिया गया। बाद में कहा गया कि उसे बस स्टैंड से पकड़ा गया है। उसे हथकड़ी भी लगाई गई। इस मामले में जांच बैठा दी गई। विभागीय जांच का फाइनल आर्डर आ गया। मिश्रा को कई तरीके से तंग किया जाने लगा। इस तरह की प्रताड़ना के चलते 1997 में वह अपने कैंप से दो तीन बार भाग जाने को मजबूर हुआ।
इसके बाद जब उसकी बटालियन दिल्ली के बवाना में आई तो यहां भी उसे परेशान किया जाने लगा। यहां तक कि उसके साथ गाली गलौच हुआ। मिश्रा ने छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया। 14 अक्तूबर 1996 से 12 दिसंबर 1996 तक उसे 'ईएल' मिली। 13 दिसंबर को जब वह वापस लौटा तो उसे फिर से परेशान किया जाने लगा। नतीजा, वह फिर कैंप से निकल गया। 13 मार्च 1997 को वापस आया तो उसे पता चला कि उसके खिलाफ एक और विभागीय जांच बैठा दी गई। इसके विरोध स्वरूप उसने वेतन लेने से मना कर दिया। जो चार्ज लगाए गए, उनमें से एक चार्ज, ड्यूटी से अनुपस्थित होना भी दिखाया गया।
यह अनुपस्थिति 89 ओर 43 दिन की थी। अप्रैल 1996 से 4 अक्तूबर 1996 तक मिश्रा ने वेतन भी नहीं लिया। हालांकि उक्त चार्ज को जांच अफसर, साबित नहीं कर सके। इसके बाद 13 मार्च 1997 को जब वह वापस ड्यूटी पर आया तो उसे जांच के दस्तावेज दिए जाने लगे। उसने लेने से मना कर दिया। मिश्रा ने जांच की प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। विभाग ने उसके घर पर बर्खास्तगी का आदेश भेज दिया। ये अलग बात रही कि मिश्रा ने उस आदेश को रिसीव नहीं किया। 6 दिसंबर 1997 को उसका डिसमिस आदेश निकला। तत्कालीन डीआईजी ने भी यह बात मानी थी कि उसे डिसमिस आदेश नहीं मिला। बाद में मिश्रा ने कहीं से वह आदेश हासिल किया और डीआईजी के समक्ष अपील की। चेन्नई रेंज के डीआईजी ने उसकी अपील को खारिज कर दिया। विशेष बात यह रही कि मिश्रा की अपील को खारिज किए जाने वाले आदेश में डीआईजी ने तत्कालीन कमांडेंट को लिखा कि आपकी जांच में 9 बड़ी गलती निकली हैं।
विभागीय जांच के बाद चार्जशीट की कॉपी, आरोपी को बाईहैंड या उसके घर में पंजीकृत डाक से भेजनी होती है। आरोपी को चार्जशीट कैसे मिली, जांच रिपोर्ट में इस बात का कोई सबूत नहीं था। मिश्रा का कहना था कि वह कॉपी मुझे नहीं मिली। कमांडेंट ने बर्खास्तगी के फाइनल आर्डर में सरकारी गवाह की स्टेटमेंट लेकर तीन पेज में आदेश निकाल दिया। डीआईजी ने लिखा कि उसे गवाह की कॉपी नहीं दी गई। ऐसे में वह कैसे खुद को डिफेंड करेगा। सीसीएस 'सीसीए' रूल 14 के नीचे इंस्ट्रक्शन 6 में लिखा है कि आरोपी की अनुपस्थिति में जांच अधिकारी ने क्या कार्रवाई की, यह सब आरोपी को लिखित में बताना होता है। सामने वाले को पूरा मौका देना होता है, क्योंकि यही प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत है। जांच में यह रिकार्ड कहीं नहीं दिखा। जांच अधिकारी ने 6 दिसंबर 1997 को बर्खास्तगी का आदेश दिया था। जब वह आदेश रिसीव नहीं हुआ तो मई 1998 में उसे दोबारा से भेजा गया।
जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं था कि बर्खास्तगी का आदेश, मिश्रा को प्राप्त हुआ या नहीं। सीओ, जांच अधिकारी की रिपोर्ट जब सिपाही को देता है तो वह 15 दिन का समय भी देता है। जांच अधिकारी की रिपोर्ट 13 नवंबर 1997 को भेजी गई। मिश्रा को वह रिपोर्ट एक दिसंबर 1997 को मिली। नियमानुसार, उसे जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए था, लेकिन बर्खास्तगी का आर्डर 6 दिसंबर 1997 को जारी कर दिया गया। ऐसे में मिश्रा को पांच दिन का ही समय मिल पाया। अपीलीय अधिकारी, डीआईजी ने उक्त जांच में 9 बड़ी गलती निकाल दी। यहां पर अनुच्छेद 311 का (2) कहता है अगर सरकारी सेवक को पद से हटाना है या रैंक को कम करना है तो जांच होगी। जो आरोपी है, उसे आरोपों के बारे में अच्छी तरह से बताना होगा। आरोपी को अपनी बात कहने का पूरा मौका देना होगा। यह दिखना चाहिए कि न्याय हो रहा है। इस मामले में जांचकर्ता ने उक्त अनुच्छेद का उल्लंघन किया है।
शरद चंद चक्रवर्ती बनाम पश्चिम बंगाल राज, केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, कि जिस पर दोष लगा है, अगर उसे चार्ज के बारे में मालूम नहीं है तो वह जांच वैद्य नहीं मानी जा सकती। राम प्यारे सिंह बनाम यूपी राज के केस में कहा गया है कि जांच अधिकारी, एक तरीके से अर्ध न्यायिक अधिकारी होता है। उसे निष्पक्ष तरीके से दोनों पक्षों को देखना चाहिए।
जब आईजी के पास इस मामले में अपील की गई तो वहां से भी वह खारिज हो गई। आईजी ने बल्कि उसमें पिछली अनुपस्थिति की एक दो अन्य घटनाओं को भी जोड़ दिया। आईजी ने जो बात जोड़ी, वह आरोपों का हिस्सा नहीं थी। यह कानूनी तौर पर सही नहीं था। तत्कालीन डीजी ने भी उक्त अपील को खारिज कर दिया। कई वर्षों बाद जब मिश्रा हाईकोर्ट में गए तो वहां पर रिट पीटिशन खारिज हो गई। सुप्रीम कोर्ट कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका डाली गई तो वह भी रिजेक्ट हो गई। रिव्यू पेटिशन भी रिजेक्ट हुई।
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ध्यान देने योग्य बात ये है कि बोधनाथ मिश्रा के वकील, डीआईजी द्वारा इंगित की गई 9 बड़ी गलतियों को न्यायालय के समक्ष बताने से चूक गए। जांच में तीन चार्ज लगे थे, जबकि जांच प्रक्रिया में 9 गलती पाई गई थी। 20 नवंबर 2024 को तत्कालीन डीजी अनीश दयाल सिंह के पास नई अपील की गई। उसमें बताया गया कि उसे एक गलत जांच के आधार पर बर्खास्त किया गया था। पहले वह गलती पकड़ में नहीं आई, लेकिन अब पकड़ में आई है। इस आधार पर मिश्रा ने खुद को बहाल करने का अनुरोध किया।
यदि आवश्यक हो तो दोबारा से इस मामले की निष्पक्ष तरीके से जांच कराई जाए। मिश्रा ने अपनी दयनीय आर्थिक हालत का हवाला भी दिया। बेटी की शादी करने की असमर्थता का भी जिक्र किया। मिश्रा ने कहा, वह विभाग की गलती की सजा 27 साल से भुगत रहा है। उसे जीपीएपफ व दूसरे भत्ते आज तक नहीं मिले। उसे हर जगह यही बात कही जाती कि आपने पहले भी अप्रोच किया है। अब अपील का चांस नहीं है। इसके बाद मिश्रा ने अपनी अपील, डीजी जीपी सिंह को भेजी। काफी प्रयासों के बाद दो मई को वीसी पर उसने डीजी के समक्ष अपना पक्ष रखा। इससे पहले वह अपनी अर्जी गृह मंत्री को भी भेज चुका था। मिश्रा के मुताबिक, जीपी सिंह ऐसे पहले डीजी हैं, जिन्होंने मेरी बात गौर से सुनी। मैने डीजी साहब को बताया कि गलत जांच के कारण आज मैं सड़क पर हूं।
बोधनाथ मिश्रा के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि अगर जांच में कोई नया तथ्य सामने आता है तो विभाग, दोबारा उस पर विचार या कार्रवाई नहीं कर सकता। अब सीआरपीएफ महानिदेशालय की तरफ से जो जवाब आया है, उसमें वही पुरानी बातें कही गई हैं। जैसे कि तुमने कई बार अप्रोच किया है। अब कोई अपील नहीं बनती है, लेकिन जो भी नए तथ्य अपील में लिखे गए थे, उनका कोई विश्लेषण ही नहीं किया गया। सीआरपीएफ आपका पैसा देने के लिए तैयार है। बोधनाथ मिश्रा ने कहा, कि अब मुझे पैसा, ब्याज सहित चाहिए, क्योंकि विभाग ने 27 साल तक मुझे पैसा नहीं दिया है।