मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर 2007 में हुए गोरखपुर के सांप्रदायिक दंगे का मुकदमा नहीं चलेगा। हाईकोर्ट ने मुकदमा चलाने के लिए जरूरी अभियोजन स्वीकृति देने से शासन के इंकार के विरुद्ध दाखिल याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने घटना की जांच सीबीआई या किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराने की मांग भी अस्वीकार कर दी है।
मामले में चल रही विवेचना के बिंदु पर विस्तृत सुनवाई और पत्रावलियां देखने के बाद अदालत ने माना कि जांच संतोषजनक तरीके से चल रही है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन स्वीकृति देने से इंकार करने के आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं है। मौजूदा स्थिति में इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। गोरखपुर के परवेज परवाज की याचिका पर न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति एसी शर्मा की पीठ ने सुनवाई की।
याची के अधिवक्ता एसएफए नकवी का कहना था कि योगी आदित्यनाथ, गोरखपुर की तत्कालीन मेयर अंजू चौधरी, राधामोहन अग्रवाल, डा. वाईडी सिंह, शिवप्रताप शुक्ला और हिंदू युवा वाहिनी के सैकड़ों कार्यकर्ता गोरखपुर में हुए 2007 के सांप्रदायिक दंगे के जिम्मेदार हैं। कोर्ट के आदेश पर इनके खिलाफ कैंट थाने में मुकदमा दर्ज किया गया मगर पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर रही है।
प्रारंभिक याचिका 2008 में दाखिल की गई थी। मार्च 2017 में इसमें एक संशोधन अर्जी देकर अभियोजन स्वीकृति देने से इंकार करने के आदेश को भी चुनौती दी गई। याची का कहना था कि मुख्यमंत्री स्वयं आरोपी हैं और वह सरकार के मुखिया हैं। उनके ही अधीनस्थों को आदेश देना है इसलिए यह उचित नहीं है। मांग की गई कि योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा चलाने का आदेश दिया जाए।
प्रदेश सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और एजीए प्रथम एके संड ने याचिका का कड़ा विरोध किया। कहा गया कि मुकदमे में आरोपी बनाए गए लोगों के खिलाफ दंगा भड़काने का पर्याप्त साक्ष्य नहीं है। अभियोजन स्वीकृति नहीं देने का निर्णय विधि सम्मत है। पुलिस इस मामले में रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है और न्यायालय में उस पर सुनवाई भी प्रारंभ है। याची अपनी बात मामले की सुनवाई कर रहे न्यायालय के समक्ष रख सकता है।