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#GandhiJayanti: कचरा निस्तारण की बड़ी चुनौती, कैसे साफ-सुथरा होगा देश

Sun, 02 Oct 2016 08:08 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ/ चंडीगढ़/ जम्मू
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- फोटो : demo
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कचरे के निस्तारण एवं प्रबधंन का तंत्र और चौपट हुआ है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल में भारी मात्रा में पैदा हो रहे कचरे का निस्तारण गंभीर चुनौती बन गया है। जम्मू में तो कचरा प्रबंधन की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं बन सकी है। इस सूबों में कुछ को छोड़ कर बाकी शहरों में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है। सालाना 176 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद लखनऊ नगर निगम शहर को साफ रखने में फेल हुआ है। करीब 100 करोड़ रुपए खर्च कर शिवरी प्लांट छह साल में किसी तरह शुरू कराया गया, जो बंद होने को है।
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लखनऊ में रोज 1600 टन कूड़ा निकलता है, जिसमें केवल 250 टन का ही निस्तारण हो पाता है। करीब 1250 टन कूड़ा गोमती नदी के किनारे व अन्य खाली जगहों पर फेंका जा रहा है। जम्मू में रोजाना 400 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसे तवी नदी के सूखे हिस्से में खुदाई करके दबा दिया जाता है।

हरियाणा में राज्य सरकार ने दो जिलों सिरसा, पंचकूला को खुले में शौचमुक्त बनाने को लेकर काम तो शुरू किया है, लेकिन साइबर सिटी गुड़गांव में कचरा निस्तारण एवं प्रबधंन की व्यवस्था फेल है। शहर से हर दिन औसतन 600 टन निकलने वाले कूड़े के निस्तारण की ठोस व्यवस्था न होने से डंपिंग के स्थान पर टीला बन गया है। कुछ लोग व्यक्तिगत स्तर पर कचरा प्रबंधन को लेकर अभियान चला रहे हैं।
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चंडीगढ़ में रोज 350 टन कूड़ा निकलता है लेकिन 250 टन कचरे का ही निस्तारण हो पाता है। 100 टन कूड़ा बिना उपचारित किए ही डपिंग ग्राउंड में फेंका जाता है। पंजाब का एक मात्र ऐसा जिला मोहाली है जिसे साफ सफाई के मामले में देश में पहला स्थान मिला है। जालंधर और मानसा दोनों शहरों में साफ सफाई व्यवस्था लड़खड़ा गई है।

हिमाचल : नदियों में बहाया जा रहा कूड़ा

- फोटो : demo
हिमाचल की राजधानी शिमला में रोजाना 70 से 80 टन कूड़ा निकलता है, जिसे नगर निगम निष्पादन के लिए चंडीगढ़ स्थित प्लांट में भेजता है। सोलन जिले का भी आधे से ज्यादा कूड़ा चंडीगढ़ भेजा जा रहा है, बाकी 16 टन कचरे को सलोगड़ा में डंपिंग साइट में फेंका जाता है। धर्मशाला में कूड़ा निस्तारण संयंत्र खराब है। मनाली और कुल्लू में अधिकांश कूड़ा ब्यास और सहायक नदियों-नालों में बहा दिया जाता है। कांगड़ा में कचरे का निस्तरण नहीं हो पा रहा जबकि ऊना में इसे स्वां नदी में बहाया जा रहा है। 

उत्तराखंड : नमामि गंगे योजना को झटका

उत्तराखंड में श्रीनगर, जोशीमठ और कर्णप्रयाग जैसी जगहों पर पालिका परिषदों ने कूड़े को कमाई का जरिया बना लिया है। यहां परिषदें कूड़े की रिसाइकिलिंग करके लाखों की आमदनी कर रही हैं। उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी, ऋषिकेश, हरिद्वार और देहरादून जिलों में कचरे के निस्तरण को लेकर हाल खराब हैं। उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और टिहरी में तो कचरा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था न होने से कूड़ा नदी-नालों और ग्रामीण इलाकों में उड़ेला जा रहा है जो बहकर भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी नदी में जा रहा है। इससे गंगा के उद्गम में ही प्रधानमंत्री की नमामि गंगे योजना को झटका लगा है। गुप्तकाशी, सोनप्रयाग से लेकर केदारनाथ तक में कूड़ा निस्तारण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हरिद्वार में कूड़ा निस्तारण सिर्फ प्लास्टिक तक ही सीमित है। 
 
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वैल्यू ऐड

- फोटो : demo
- भारत में हर साल 18.5 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा होता है। 2018 तक यह 30 लाख मीट्रिक टन हो जाएगा।

- देश में रोजाना 15 हजार टन से अधिक प्लास्टिक कचरा निकलता है, इसमें छह हजार टन बिना उठाए रह जाता है।

- सीपीसीबी की 2014-15 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 5.14 करोड़ टन ठोस कचरा निकलता है।

- 27 फीसदी ठोस कचरे का ही शोधन हो पाता है तथा बाकी 73 फीसदी डंपिंग साइटों पर फेंक दिया जाता है।
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