भारत और पाकिस्तान के मध्य 1960 की सिंधु जल संधि के तहत स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई थी। इस संधि के तहत आयोग को संधि के क्रियान्वयन सिंधु जल तंत्र के विकास के लिए दोनों पक्षों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने को सहयोगी व्यवस्था स्थापित करने और बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई। आयोग में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व उनके आयुक्त करते हैं।
आजादी के समय से जारी है यह विवाद
1947 में पंजाब के विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच नहर के पानी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। नहरें आर्थिक नजरिए से उस वक्त बनाई गई थीं जब विभाजन का विचार किसी के मन में नहीं था, लेकिन विभाजन के कारण नहरों के पानी का बंटवारा असंतुलित हो गया। पंजाब की पांचों नदियों में से सतलुज और रावी दोनों देशों के मध्य से बहती हैं। वहीं झेलम और चिनाब पाकिस्तान के मध्य से और व्यास पूर्णतया भारत में बहती हैं।
लेकिन भारत के नियंत्रण में वे तीनों मुख्यालय आ गए जहां से दोनों देशों के लिए इन नहरों को पानी की आपूर्ति की जाती थी। पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत सिंचाई के लिए इन नहरों पर ही निर्भर है। पाकिस्तान को लगने लगा कि भारत जब चाहे तब पानी बंद करके उसकी जनता को भूखा मार सकता है। इसीलिए विभाजन के बाद पानी विवाद शुरू हो गया। 1947 में कश्मीर को लेकर जंग लड़ चुके दोनों देशों के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ने लगा।
1949 में एक अमेरिकी विशेषज्ञ डेविड लिलियेंथल ने इस समस्या को राजनीतिक स्तर से हटाकर टेक्निकल और व्यापारिक स्तर पर सुलझाने की सलाह दी। लिलियेंथल ने विश्व बैंक से मदद लेने की सिफारिश भी की। सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार किया। सालों तक बातचीत चलने के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल पर समझौता हुआ। संधि के मुताबिक इस आयोग की साल में कम से कम एक बैठक भारत-पाकिस्तान में होनी चाहिए। आयोग की 113वीं बैठक पिछले वर्ष 20 से 21 मार्च तक पाकिस्तान में हुई थी।
क्या रद्द हो सकती है संधि?
सिंधु के पानी को लेकर दोनों के बीच खींचतान भी चलती रही है। पाकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पाकल (1,000 मेगावाट), रातले (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट), मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठाता रहा है। हालांकि जानकार यह भी कहते हैं कि कश्मीर अपने जलसंसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है। जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसके लिए केंद्र को कुछ करना चाहिए।
विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत यह कहकर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।