नग्गी युद्ध स्मारक में श्रद्धांजलि देते छात्र।
- फोटो : Amar Ujala
भारत-पाकिस्तान सीमा पर नग्गी गांव में भारतीय सेना के बहादुर जवानों के आखिरी बलिदान के बाद हमने सन 1971 की जंग जीती। नग्गी युद्ध स्मारक में आज भी देश के उन 21 वीर सपूतों की बलिदान गाथा दर्ज है, जिन्होंने 27 दिसंबर 1971 की रात अपने प्राण न्योछावर कर पाकिस्तानी सेना को भारत के इस आखिरी गांव से खदेड़ दिया था। भारत 1971 युद्ध में पाकिस्तान के साथ दो छोर पर लड़ रहा था।
एक तरफ पूर्वी पाकिस्तान और दूसरी तरफ पश्चिमी पाकिस्तान से मुकाबला हो रहा था। इस बीच भारतीय सेना ने दोनों छोरों पर पाकिस्तानी आर्मी को घुटनों पर ला दिया था। इसके बाद 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने दिल्ली में हमारे साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ सरेंडर साइन किया गया। पाकिस्तान युद्ध हार गया था, इसके दो टुकड़े हो गए थे। पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया था, लेकिन नग्गी में बैठी पाकिस्तान आर्मी की अक्ल अभी भी ठिकाने नहीं आई थी।
नग्गी के वीरों को मिले 5 गैलेंट्री अवॉर्ड
मेजर नंद गोपाल के मुताबिक, 1971 युद्ध के बाद जब गैलेंट्री अवाॅर्ड की घोषणा की गई तो नग्गी के वीरों को 5 अवाॅर्ड देकर सम्मानित किया गया। इनमें मेजर वीके बेरी को महावीर चक्र, हवलदार गुरुंग को वीरचक्र से नवाजा गया और तीन सेना मेडल अन्य जवानों को दिए गए।
बॉर्डर पर्यटन स्थल के रूप में हो रहा विकसित
राजस्थान सरकार ने 2023-24 में नग्गी युद्ध स्मारक स्थल को विकसित किया और अब इसे बॉर्डर पर्यटन स्थल के अंदाज में विकसित किया जा रहा है। यहां हर साल 28 दिसंबर को नग्गी दिवस मनाया जाता है।
आज भी नग्गी की हिफाजत कर रहे मोहन लाल
नग्गी गांव के रहने वाले पुजारी मोहन लाल 1971 के युद्ध के दौरान 16 साल के थे। वह बताते हैं कि 26 दिसंबर को पाकिस्तान की सेना ने फिर से हरकत शुरू कर दी। 27 दिसंबर को भारत की फौज ने बहादुरी से लड़कर पाकिस्तानियों को खदेड़ा था। वह तब से नग्गी युद्ध स्मारक की हिफाजत कर रहे हैं।