14 में से 12 राज्यों ( जिनमें केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं) का कहना है कि मौत की सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए। यह मृत्युदंड की समाप्ती के खिलाफ हैं। इनका कहना है कि मृत्युदंड के समाप्त होने से रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में आरोपियों का बचाव होगा। गृह मंत्रालय ने एक प्रस्ताव जारी कर मृत्युदंड के बारे में पूछा था। 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने गृह मंत्रालय के प्रस्ताव का जवाब दिया। केवल दो राज्यों कर्नाटक और त्रिपुरा का कहना है इसे खत्म किया जाना चाहिए।
जस्टिस एपी शाह की अध्यक्षता में भारतीय विधि आयोग ने अपनी 2015 की रिपोर्ट में एक प्रस्ताव जारी किया। इसमें उन्होंने मृत्युदंड को गैर-आतंकी मामलों में खत्म करने का प्रस्ताव दिया। इसी दौरान मंत्रालय ने इस पर राज्य सरकारों की राय मांगी। मृत्युदंड की समाप्ती के लिए गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश और राज्यों ने वीटो डाला। वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक अभी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों का जवाब आना बाकी है। अभी केवल 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के ही जवाब आए हैं। साथ ही शासन में बदलाव के बाद त्रिपुरा भी अपना फैसला बदल सकता है।
भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन, इराक, इरान और सऊदी अरब जैसे चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी फांसी की सजा दी जाती है। 2014 के अंत तक करीब 98 देशों ने मृत्युदंड को समाप्त कर दिया था। जबकि 7 देशों ने इसे मामूली अपराधों के लिए समाप्त किया। सुरीनाम, मेडागास्कर और फिजि ने 2015 में मृत्युदंड को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया था।
भारत की बात की जाए तो यहां हाल ही में 26/11 हमलों के आतंकी अजमल कसाब को साल 2012 में फांसी हुई। 2001 के संसद हमले के आरोपी अफजल गुरू को फरवरी 2013 में फांसी हुई। 1993 मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकुब मेमन को जुलाई 2015 में फांसी दी गई। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग से पूछा था कि क्या मृत्युदंड एक जघन्य सजा है।
इसके बाद साल 2015 में आयोग ने, जस्टिस शाह की अध्यक्षता में मौजूद अन्य सदस्य ऊषा मेहरा, प्रोफेसर मूल चंद शर्मा, जस्टिस एसएन कपूर ने मृत्युदंड को समाप्त करने की सिफारिश की। सदस्यों ने अपने प्रस्ताव में कहा कि युद्ध छेड़ने और आतंकवाद जैसे अपराधों को छोड़कर बाकी सभी अपराधों में मृत्युदंड को समाप्त कर दिया जाए। इसके अलावा कानून निर्माताओं की रिपोर्ट के अनुसार, उनका कहना है कि उन्हें मृत्युदंड को आतंक से जुड़े
अपराधों को छोड़कर अन्य सभी अपराधों में समाप्त करने के लिए इंतजार करने का कोई कारण नहीं दिख रहा है।