अंब (ऊना)। जिसने जीवन की व्यर्थता नहीं जानी, वह परमात्मा की खोज पर नहीं जाएगा। जीवन की व्यर्थता समझ में आ जाने पर दो संभावनाएं बनती हैं या तो हम उसी व्यर्थता में रुक जाएं या उस व्यर्थता के पार सार्थकता की खोज करें। उक्त अमृत वचन श्रीमद्भागवत कथा के समापन सत्र में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने शिव मंदिर, पंगलू में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आस्तिक के जीवन में भी नास्तिकता का ठहराव आता है, लेकिन वह उसी पर रुक नहीं जाता। जिसने दुख को जाना वह सुख को जानने में समर्थ है अन्यथा दुख को भी न जान सकता। उन्होंने कहा कि अंधे को अंधेरा नहीं दिखाई पड़ता। कथा में जरासंध का वध, पांडवों का राजसूय यज्ञ, शिशुपाल का उद्धार, सुदामा को दिव्य ऐश्वर्य की प्राप्ति, भगवान का स्वधाम गमन एवं राजा परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति का प्रसंग सभी ने अत्यंत श्रद्धा से सुना। आरती के पश्चात विशाल लंगर भंडारे का भी आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रमुख रूप से कथा के मुख्य यजमान ठाकुर मान सिंह, प्रकाश चंद्र, सुभाष चंद्र, राजिन्दर पाल सिंह, कुलभूषण सिंह, साहिल ठाकुर, निखिल ठाकुर, कृशांश ठाकुर, करतार सिंह राणा, रमेश चंद्र चौधरी, मुकेश धीमान, सुमिता ठाकुर सहित अन्य उपस्थित रहे।