परशुराम जयंती पर विशेष
ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर पढ़े शास्त्र और लिया शस्त्र ज्ञान
देवव्रत, द्रोणाचार्य, कर्ण जैसे योद्धाओं को दी शास्त्र विद्या
एसडी शर्मा
मैहतपुर (ऊना)। अक्षय तृतीया पर 30 अप्रैल को बैशाख शुक्ल पक्ष में भगवान परशुराम की जयंती देश दुनिया में मनाई जा रही है। आज स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। न तो कुंडली देखने औरना ही किसी विद्वान पुरोहित को शुभ मुहूर्त पूछने की आवश्यकता है। हालांकि, मंगलवार को भी अनेक धार्मिक संगठनों ने भगवान श्री परशुराम की जयंती मनाई। अक्षय तृतीया ऐसा स्वयंसिद्ध मुहूर्त है, जिसमें आप किसी भी समय कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ कर सकते हैं। वाहन खरीदना, घर की नींव रखने, विवाह, मुंडन संस्कार अथवा स्वर्ण आदि खरीदने के लिए आज का दिन बेहद शुभ माना गया है। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर जन्मे पांच पुत्रों रुक्मवान, सुसेन, वसु, विश्वावसु और राम सबसे छोटे थे। आयु में भले ही सबसे छोटे थे, परंतु गुणों में सबसे महान थे। आरंभिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में हुई। इसके बाद कैलाश गिरीश्रंग पर स्थित भगवान शंकर के यहां विद्या ग्रहण करने गए। बल, बुद्धि, विवेक से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने अमोक शस्त्र ‘परशु’ परम शिष्य राम को प्रदान किया। इसके बाद इनका नाम परशुराम हो गया। परशुराम दानी और ब्रह्मज्ञानी हैं। एकादश छंदयुक्त शिव पंचत्वारिंश नामक स्तोत्र की रचना की थी। गणेश पुराण के अनुसार एक बार परशुराम भगवान शंकर के दर्शनों के लिए गए। कैलाश पर्वत पर गणेश जी ने इन्हें रोक दिया और मिलने नहीं दिया। इस पर क्रोधित होकर भगवान परशुराम ने गणेश जी पर प्रहार किया, जिससे उनका एक दांत टूट गया। इस घटना के बाद गणेश एक दंत नाम प्रचलित हुआ। अस्त्र, शास्त्र के परम ज्ञाता परशुराम से अनेक महान योद्धाओं ने शिक्षा ग्रहण की। इनमें देवव्रत, द्रोणाचार्य तथा महान योद्धा कर्ण शामिल हैं। कर्ण ने असत्य बोलकर इनसे शास्त्र विद्या ग्रहण की। इस बात का पता चलने पर उन्होंने कर्ण पर क्रोधित होकर श्राप दिया कि जो विद्या तूने असत्य का सहारा लेकर ग्रहण की है, उसकी आवश्यकता पड़ने पर वे उसे भूल जाएगा। महाभारत युद्ध में अर्जुन के समक्ष जब उसे उस विद्या की बेहद आवश्यकता थी तो वह मंत्र भूल गया और अर्जुन ने उसका वध किया। भगवान परशुराम बेहद क्रोधी स्वभाव, मगर सच्चे पितृभक्त हैं। पिता की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया तो पिता महर्षि जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा। उन्होंने पिता से कहा कि वह मेरी माता को पुनः जीवित कर दें तथा मैं कभी भी पराजित न हो सकूं और लंबी आयु का वरदान मांगा। महर्षि जमदग्नि ने कहा तथास्तु।