संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। मनुष्य को यह व्यर्थ का भ्रम छोड़ देना चाहिए कि मैं कर रहा हूं, वास्तव में सब कुछ यंत्रवत हो रहा है। सारा जगत यंत्रवत चल रहा है। हमारा ज्ञान टिमटिमाते जुगनू की तरह है, जबकि परमात्मा महासूर्य, हमारा ज्ञान मिट्टी के जलते हुए दीपक की तरह है। इसमें धुआं भी है, दुर्गंध भी। प्रभु का चिंतन धुआं, कालिख, दुर्गंध को मिटाकर दिव्य आलोक से हमें प्रकाशित कर देता है। ये अमृत वचन श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में अतुल कृष्ण ने सलोह कुटिया आश्रम ऊना में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म की सीढ़ियां चढ़ने वाला एक दिन अंततः परम पद को प्राप्त कर लेता है। धर्म ही हमें सिखाता है कि मनुष्य नहीं, सब कुछ परमात्मा कर रहा है। ज्ञान हमारे अहंकार को तोड़कर ऊपर की यात्रा पर भेज देता है। परमात्मा किसी भी वस्तु पर अपनी घोषणा नहीं करता, लेकिन सच्चाई यही है कि सभी का मालिक वही है। मालिक को घोषणा करने की जरूरत नहीं होती, परमात्मा संपूर्ण ब्रह्मांड की हर वस्तु का अघोषित मालिक है।