संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। चैतन्य हमारा स्वभाव है। हमें यह बात समझ आनी चाहिए कि सिवाय चैतन्य के मेरा अपना कोई नहीं। उक्त कथासूत्र शिव महापुराण कथा के द्वितीय दिवस में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण महाराज ने कम्युनिटी सेंटर, ज्वार में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि व्यर्थ है सारे जगत की यात्रा अगर हम अपने से अपरिचित रह गए। अगर स्वयं को न जान पाए और सब भी जान लिया तो वह सारा ज्ञान भी इकट्ठे जोड़ में अज्ञान ही सिद्ध होगा। अगर अपने को न देख पाए और सारे संसार को देख डाला, चांद-तारे छान डाले तो भी हम अंधे ही रहेंगे। क्योंकि आंख तो उसी को मिलती है, जो स्वयं को देख लेता है। ज्ञान तो उसी को मिलता है जो स्वयं से परिचित हो जाता है। उन्होंने कहा कि आंख हमेशा दूसरे को देखती है। हाथ दूसरे को छूते हैं। मन दूसरे की सोचता है और तुम सदा अंधेरे में खड़े रह जाते हो। तुम्हारी हालत वही है जो दिए तले अंधेरे की होती है। संसार में दुख का इतना ही कारण है कि हमने अपने सपनों की नाव दूसरों के साथ बांध रखी है। कथा में शिवलिंग की स्थापना, पूजन की विधि, शिव पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्म, संध्या वंदन, गायत्री जप की महिमा, भस्म धारण की विधि, रुद्राक्ष एवं बिल्व पत्र के महत्व का प्रसंग लोगों ने बड़ी श्रद्धा से सुना।
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