ऊना। जिला में पशुपालन करने वाले लोगों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। हरी घास जुटाने से लेकर पशुओं की खुराक से जुड़ी सामग्री की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण पशुपालक इस व्यवसाय से हाथ खींचने लगे हैं।
बीते एक दशक के दौरान सामने आए आंकड़ों की मानें तो 20 प्रतिशत पशु कम हो चुके हैं। जानकारी के अनुसार इस समय जिला ऊना में 60,000 गाय और 1.10 लाख दुधारू भैंसे हैं, जिनकी देखरेख पशुपालक करते हैं। जबकि पिछले एक दशक पर नजर दौड़ाएं तो एक लाख गाय थी। वहीं भैंसों की संख्या भी 1.50 लाख के करीब थी। लेकिन इस महत्वपूर्ण पेशे से अब लोग हाथ खींचने लगे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि पशुओं की खुराक पुराने दामों के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक हो गई है। इसके साथ ही पशुओं के लिए हर मौसम में हरा चारा भी उपलब्ध नहीं हो पाता। इसके साथ ही तूड़ी के प्रति क्विंटल दाम भी सातवें आसमान पर पहुंच रहे हैं, लेकिन दूध की कीमत अभी भी 50 से 60 रुपये प्रति किलो के इर्दगिर्द घूमती है। अगर पशुपालक अधिक दाम मांगते हैं, तो उन्हें कोई खरीदार नहीं मिलता।
पशुपालक जीतराम, सुरिंद्र सिंह, शिव कुमार, दीवान चंद, राकेश कुमार ने बताया कि पशुओं को पालने से लेकर उनके दूध हासिल करने में लंबा इंतजार करना होता है। इस दौरान हजारों की खुराक पशुओं की दी जाती है। जो किसी गिनती में नहीं आती। उन्होंने कहा कि अच्छे बिनौले 4000 से 4500 रुपये प्रति क्विंटल कीमत पर मिलते हैं। तूड़ी के दाम सर्दियों में 1500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाते हैं। हरी घास के मैदान भी कम हो गए हैं। कुल मिलाकर पशुपालकों के लिए चुनौतियां बहुत बढ़ चुकी हैं। इससे लोगों ने दूसरे व्यवसाय तलाश कर लिए।
कोट्स
ऊना जिला में पशुपालन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। लोगों को इस पेशे के लिए प्रेरित करने से लेकर उन्हें बिक्री प्लेटफार्म उपलब्ध करवाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उम्मीद है कि आने वाले कुछ माह के भीतर इससे जुड़े सकारात्मक फैसले सामने आएंगे, जिससे दुधारू पशुओं का पालन दोबारा बढ़ेगा।
डाॅ. विनय शर्मा, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग, ऊना