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Una News: फ्रिज के युग में आज भी मिट्टी के बर्तनों का महत्व बरकरार

Sat, 13 Apr 2024 01:44 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
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गगरेट के ​​शिवबाडी में मिट्टी के बर्तन रख ग्राहक का इंतजार करता हुआ ।संवाद
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बैसाखी मेले में मिट्टी के बर्तन घर ले जाने की परंपरा जारी
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गर्मी की दस्तक के साथ बर्तन के खरीदारों में होती है बढ़ोतरी

राजिंद्र शर्मा

मुबारिकपुर (ऊना)। विज्ञान की तरक्की से लोगों को हर सुविधा प्राप्त होती है, लेकिन पारंपरिक रहन-सहन और उससे जुड़ी वस्तुएं आज भी अपना महत्व रखती हैं। जैसे मिट्टी के बर्तन आज भी फ्रिज से बेहतर माने जाते हैं। गर्मी का मौसम आते ही मिट्टी के बर्तनों की लोग खरीद करने लगे हैं। विशेषकर बैसाखी के मेलों में मिट्टी के घड़े व अन्य बर्तनों की खरीद करना लोग शुभ मानते हैं।
जानकारी के अनुसार प्राचीन काल से मेले भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। मेलों में लोग धार्मिक स्थलों में जाकर देवी-देवताओं का आशीर्वाद भी लेते हैं। इसके साथ ही पारंपरिक वस्तुओं की खरीद करते हैं। कई दशक पहले लोग अपने बैसाखी के मेले से घरों को वापसी के समय मिट्टी बर्तन, जैसे घड़े ले जाते थे, ताकि इनसे गर्मी के मौसम में शीतल स्वास्थ्यवर्धक पानी का आनंद उठा सकें। उस दौर में घड़ों के शीतल पानी का स्वाद हर किसी का पसंदीदा रहा। आज भी इन मेलों में मिट्टी के बर्तनों का बाजार लगता है। बुजुर्गों से चली आ रही मिट्टी के बर्तन घरों को लेकर जाने की परंपरा कई क्षेत्रों में आज भी चली आ रही है।
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स्थानीय निवासियों में हेमलता, कृष्णा, अनुराधा, आशू, संजीव, सूर्यांश ने कहा कि मिट्टी के बर्तन ले जाने की परंपरा आज भी उनके लिए अनुकरणीय है। कहा कि महंगे फ्रिज तथा बिजली के उपकरणों से ठंडे जल में घड़े में शीतल हुए जल जैसा न तो गुण हैं और न ही स्वास्थ्यवर्धक होता है। बैसाखी के मेले के एक दिन बाद परिवार से महिलाओं द्वारा मेले में जाकर मिट्टी के बर्तन घरों को लाने की परंपरा आज भी जारी है।
इन दाम पर उपलब्ध हैं बर्तन
इन दिनों बाजार में आने वाले मिट्टी के बर्तनों घड़ोली 70 से 100 रुपये, घड़ा 100 से 150 रुपये में उपलब्ध हो रहा है। वहीं, समय के साथ मिट्टी के बर्तनों ने नया रूप भी ले लिया है। इन दिनों बाजार में घड़ोली, घड़े और मटकों को नल भी लगे हुए हैं, जिनकी कीमत आकार के हिसाब पर 100 रुपये से 350 रुपये तक भी रखी गई है।
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समय के साथ घटे खरीदार
मिट्टी के बर्तनों का कारोबार करने वाले राकेश और दिलदार का कहना है कि समय के साथ मिट्टी के बर्तनों के खरीदार घटे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें इस कारोबार में महंगाई के दौर में काफी खर्चा पड़ता है। कहा कि वह मिट्टी के घड़े, घडोली, गोलक, ढकनी, मटके आदि बनाते है तथा स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले मेलों में पहुंचाते हैं। उन्हें सरकार की तरफ से कोई भी ऐसी प्रोत्साहन योजना का लाभ नहीं पहुंचा है, जिससे वह अपने कारोबार को आगे बढ़ा सकें। वहीं, ग्रामीण विकास एजेंसी की तरफ से भी किसी भी प्रकार की ट्रेनिंग या ऋण जैसी सुविधा की कोई जानकारी उन तक नहीं पहुंची।

गगरेट के शिवबाडी में मिट्टी के बर्तन रख ग्राहक का इंतजार करता हुआ ।संवाद

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