ऊना। विभिन्न राज्यों सहित पंजाब से हिमाचल में विवाह कर यहां की बहू बनी विवाहिताओं की जाति प्रमाणपत्र प्रक्रिया की जटिलताएं दूर नहीं हो पाई हैं। बीते कई वर्षों से समस्या का समाधान करने में हर सरकार असमर्थ है। विशेषकर जिला ऊना से सटे पंजाब के क्षेत्र से आई विवाहिताएं इस समस्या से खासी परेशान हो चुकी हैं। समस्या के समाधान को लेकर सरकार एवं प्रशासन के दरबार में कई बार आवाज उठा चुके अनुसूचित जाति संगठन भी मुद्दे को लेकर मुखर हो चुके हैं।
संगठन के पदाधिकारियों की मानें तो पंजाब से यहां जिला ऊना एवं अन्य जिलों में विवाह कर आई महिलाओं को अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी करने में संबंधित तहसील एवं उपतहसील कार्यालयों में प्रक्रिया बड़ी पेचिदा है। इन विवाहिताओं को जिला ऊना एवं प्रदेशवासी बाकी बहुओं की तरह अनुसूचित जाति प्रमाण पंचायत एवं पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर तहसील कार्यालय से नहीं मिलता। दूसरी ओर जिला ऊना के तहसील कार्यालय में पंजाब के संबंधित गांव के जनप्रतिनिधि, पटवारी एवं तहसीलदार की रिपोर्ट के अनुसार ही उन्हें मायके अनुसार अनुसूचित जाति के तौर पर प्रमाणित किया जाता है, जबकि असल में यहां पर वह जाति सीधे तौर पर अनुसूचित जाति में शामिल होती हैं, जबकि उक्त विवाहिता को राशन कार्ड, आधार कार्ड, बोनोफाइड आदि सुविधाएं मिल जाती हैं, लेकिन जाति प्रमाणपत्र के लिए आज भी सीधी प्रक्रिया नहीं बन पाई है।
स्थानीय बहुओं की तरह मिलना चाहिए जाति प्रमाणपत्र
बहुजन सुरक्षा संघ के संस्थापक बलवंत सिंह, दलित कल्याण परिषद खंड ऊना के पूर्व अध्यक्ष कश्मीरी लाल शूंटी ने बताया कि जिला ऊना में विवाह कर पंजाब या अन्य राज्यों से आई विवाहिताओं को जाति प्रमाणपत्र स्थानीय बहुओं की तरह मिलना चाहिए। कई बार इस मांग को सरकारों के समक्ष उठाया गया। चिंता का विषय यह है कि उक्त पात्र के बच्चे सभी अधिकारों के हकदार हैं, लेकिन स्वयं उन बच्चों को जन्म देने वाली मां को अन्य राज्य का तमगा देकर अनुसूचित जाति अधिकारों सहित लाभों से वंचित रखा जाता है। यह बड़ी विड़ंबना है, सरकार इसका जल्द से जल्द समाधान करे, क्योंकि पंजाब या संबंधित राज्य में उक्त महिला का राशन कार्ड से नाम कट जाता है और वह अधिकांश अधिकारों से वहां से वंचित हो जाती है, जबकि हिमाचल में आकर उसे वह लाभी बहू होने के नाते नहीं मिल पाते।
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जाति प्रमाणपत्र एवं आरक्षण को लेकर पहले से ही प्रक्रिया कानूनन है। यह मायके पक्ष में परिजनों के आधार पर होती है न कि ससुराल पक्ष के आधार पर। इसलिए उक्त प्रमाणपत्र उसके ससुराल के आधार पर न बनकर मायके पक्ष की संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट अनुसार बनता है।
-महेंद्र पाल गुर्जर, एडीसी, ऊना