घड़े-सुराही गायब, खोती जा रही मिट्टी में जान फूंकने की कला
शिवबाड़ी मेले में गरीबों के फ्रिज कहे जाने वाले घड़ों बेचने वाले व्यापारी मायूस
आधुनिकता की दौड़ में घटी मिट्टी के बर्तनों की मांग, लुप्त हो रही विरासत
विवेक शर्मा
गगरेट(ऊना)।
कोई समय था जब अपने हाथ के हुनर से मिट्टी में जान फूंकने वाले की कद्र थी। उनके बनाए मिट्टी के बर्तन हाथों हाथ बिक जाया करते थे। आजकल मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की पहचान खोती जा रही है। हालांकि कुछ लोग अपनी इस विरासत को संजोए हैं और अभी भी अपने पुश्तैनी कार्य में जुटे हैं। लोगों की जरूरत के मुताबिक गरीबों के फ्रिज कहे जाने वाले घड़ों और सुराही सहित अन्य मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। ग्रामीण मेला शिवबाड़ी में कुनेरन और ठठल से मिट्टी के बर्तनों की दुकान लगाने आए गुरबचन और तरसेम लाल का दर्द कुछ इस तरह सामने आया। उनके मुताबिक वह पिछले लगभग 50 वर्षों से शिवबाड़ी मेले में मिट्टी के बर्तन का व्यापार करते आ रहे हैं। उनसे पहले उनके बुजुर्ग यहां मेला में मिट्टी के बर्तन बेचा करते थे। उन्होंने कहा कि अब तो मात्र यहां दुकान लगाना अपनी विरासत को संजोए रखने के लिए ही है। अब इस मेले में मिट्टी के बर्तनों के खरीदार बहुत ही कम रह गए हैं। उनके मुताबिक आज की युवा पीढ़ी अपने इस पारंपरिक धंधे को सलाम करते हुए किसी अन्य धंधों में हाथ आजमा कर अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रही है। उन्होंने बताया कि जो हाथ पहले मिट्टी में जान फूंकते थे, अब वही उंगलियां कंप्यूटर के की-बोर्ड पर थिरकती हैं। अब उन्हें आजीविका चलाने व समय के साथ कदमताल करते हुए घर से बाहर का रुख करना पड़ रहा है। गुरबचन ने बताया कि इस बार मेले में नाम मात्र के ही घड़ों की बिक्री हुई जिससे उनका खर्च भी नहीं निकल पाया। क्षेत्र के लोगों रमेश लौ, ईश्वर चंद्र, विजय भारद्वाज, डॉ. बीडी पाराशर, अरविंद, इंद्रजीत, रमेश हीर, राजीव ठाकुर, रविंद्र कुमार, राजेंद्र के अनुसार पहले शिवबाड़ी मेले में मिट्टी के बर्तन खरीदना एक शगुन होता था। पुराने समय में फ्रिज भी कम हुआ करते थे। आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन कम होता जा रहा है। उनके मुताबिक सरकार इस बारे में कोई योजना बनाए। जिसके तहत इस प्राचीन विरासत को बचाया जा सके।