फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हिमाचल के किसान कर सकेंगे अब बिना मिट्टी के खेतीबाड़ी

Mon, 19 Dec 2016 11:27 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, साोलन
विज्ञापन
विज्ञापन
विदेशों की तर्ज पर अब जिला सोलन समेत प्रदेश के किसान बिना मिट्टी के खेती की शुरुआत करेंगे। यह संभव होगा बिना मिट्टी के खेती यानी हाइड्रोपॉनिक्स (जल कृषि) से, जो पूरी तरह से आधुनिक तकनीक है और एशिया के चाइना, थाइलैंड, इंडोनेशिया सहित यूरोपीय देशों में भी इस तकनीक से फार्मिंग की जा रही है। लिहाजा जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर फसलों पर पड़ रहा है।
विज्ञापन


खेतों में कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी भी पूरी तरह से बदल गई है। जमीन में पोषक तत्व नहीं बचे हैं और कुदरत की मार ने किसानों को खेती से दूर कर दिया है। भविष्य में हाइड्रोपॉनिक्स फार्मिंग ही एक बेहतरीन विकल्प के रूप में उभरेगा। यह खुलासा सोमवार को डा. यशवंत सिंह परमार औद्योनिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी में विश्वविद्यालय के मृदा एवं जल प्रबंधन विभाग द्वारा जल प्रवाह तकनीक हाइड्रोपॉनिक्स शहरी कृषि के लिए एक वरदान पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कुलपति डा. हरि चंद्र शर्मा ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की।

हाइड्रोपॉनिक्स यानी जल कृषि में पत्तेदार सब्जियों जैसे लेट्यूस, सेलरी व चेरी टमाटर, खीरा आदि को मिट्टी में न उगाकर बड़ी ट्रे में उगाया जाता है। पौधों का आधार तैयार करने के लिए नारियल जूट व कई अन्य चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। पॉलिहाउस में पूरी तरह से कंप्यूटराइज सिस्टम से जल कृषि की जाती है। पौधों में मिनरल युक्त पानी का प्रयोग किया जाता है। सिंचाई के लिए पानी को पहले आरओ से फिल्टर किया जाता है।
विज्ञापन


हाइड्रोपॉनिक्स काफी महंगी तकनीक है। संसाधनों और जानकारी के अभाव में इसे आम किसान नहीं अपना सकते हैं, लेकिन उद्यान विभाग जलकृषि के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर सकता है। अगर हाइड्रोपॉनिक्स करने वाले किसानों को सब्सिडी दी जाए तो यह खेती काफी कारगर साबित हो सकती है।

वक्ताओं ने कहा कि इंजीनियर व वैज्ञानिक मिल कर काम करें ताकि इस विधि का अधिक से अधिक लाभ किसानों तक पहुंच सके। इस विधि द्वारा सब्जियों की गुणवत्ता को कैसे बनाया रखा जा सकता है तथा स्वास्थ्य पर उनका क्या प्रभाव रहता है इस पर भी विचार होना। इस दौरान बताया कि इस तकनीक से उगाई गई सब्जियां ताजी व रसायनों से अछूती होंगी।

यही नहीं पानी की 20 गुणा तक बचत होती है। इस कार्यशाला में नौणी विश्वविद्यालय के अतिरिक्त, हैदराबाद, केरल, दिल्ली व पंजाब से आए विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। मंच का संचालन प्रधान वैज्ञानिक एवं जन संपर्क अधिकारी डा. अनिल सूद ने किया।

इस दौरान वानिकी महाविद्यालय के डीन डा. पवन कुमार महाजन, निदेशक विस्तार शिक्षा डा. केएस वर्मा, डीन बागवानी महाविद्यालय डा. जेएन शर्मा, सी-डैक मोहाली से ई जसपाल सिंह, प्रदीप चोपड़ा, वरिष्ठ निदेशक इलेक्ट्रोनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार डा. मनमोहन सिंह, रजिस्ट्रार यशपाल शर्मा मौजूद रहे। इस दौरान वानिकी महाविद्यालय के डीन ने किसानों को व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर वैज्ञानिकों से इस प्रकार की तकनीकी जानकारी साझा करने की अपील की।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें