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बदलाव : बदलते-बदलते सोलनी रा मेला अब बना गया शूलिनी मेला

Tue, 21 Jun 2016 10:30 PM IST
ब्यूरो, सोलन
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शूलिनी मेला सदियों से मनाया जाता है। - फोटो : अमर उजाला
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शूलिनी मेला सदियों से मनाया जाता है। लेकिन मेला मनाए जाने की परंपरा में अब काफी अंतर आ चुका है। पहले यह मेला माता के मंदिर पर ही मनाया जाता था। इसमें गांव के लोग अपनी छमाही की नई पैदावार के दो पाथे यानि चार सेर अनाज मंदिर में चढ़ाते थे। इसके अतिरिक्त मंदिर में दूध-घी तथा श्रद्धानुसार धन भी चढ़ाया जाता था। लेकिन समय बदलने के साथ इस मेले का स्वरूप भी आधुनिक हो गया है।
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  यह मंदिर में विभिन्न मिष्ठान तथा भेंट के रूप में नगदी चढ़ाए जाने की परंपरा है। मंदिरों के पुजारियों तथा अन्य
कारकरिंदों को इस मेले में भाग लेना जरूरी होता है। देवी की पूजा में जागरण (जागरा) पूरी रात जागते हुए माता का भजन कीर्तन किया जाता है। छमाही पूजा में नया अनाज भेंट करना तथा जागरण में भाग लेना जरूरी होता है। उन्हें देव दोष लगता है, ऐसी मान्यता है। इस मेले को सोलनी रा मेला कहा जाता था। लेकिन बाद में इसे सोलन ग्रीष्मोत्सव का नाम दिया जाने लगा है। वर्तमान में राज्य सरकार ने इसे राज्य स्तरीय मेला घोषित किया तथा इसका नामकरण राज्यस्तरीय शूलिनी मेला हो गया है।

लोकाचार
माता शूलिनी की पूजा अर्चना सनातन विधि से की जाती है। पुजारी बताते हैं कि पहले कोई लोक गाथा या भारता माता की रही होगी। इस बात का उन्हें भान नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में कोई गाथा, स्तुति और विशेष मंत्र माता की पूजा के लिए नहीं है। मंदिर में माता को नारियल, मिठाई, दूध, घी, अनाज, धूप आदि चढ़ाया जाता है। बलि प्रथा नहीं है। लेकिन इस मंदिर के कल्याणा शेर सिंह ठाकुर बताते हैं कि जो परिवार इस देवी को अपनी कुलदेवी मानते हैं, उन्हें अपने ज्येष्ठ पुत्र के जन्म पर माता को भेंट स्वरूप बकरा चढ़ाने का विधान है। इसे उस पुत्र के विवाह से पूर्व पूर्ण करना जरूरी माना जाता है।
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मंदिर में श्रद्धालुओं को दी जाने वाली सुविधाएं
मंदिर को हिमाचल प्रदेश धार्मिक संस्थान एवं पूर्त विन्यास अधिनियम 1984 के तहत वर्ष 2005 में सरकार ने अधिगृहीत किया। इस मंदिर की उत्कृष्ट व्यवस्था के लिए मंदिर न्यास के आयुक्त उपायुक्त सोलन हैं। मंदिर को अधिगृहीत करने के बाद यहां पर अनेकों विकास हुए हैं। मंदिर की सुचारु रूप से व्यवस्था की जा रही है। मंदिर में श्रद्धालुओं के ठहरने आदि की कोई भी सुविधा फिलहाल कोई उपलब्ध नहीं है। लेकिन मंदिर न्यास द्वारा मंदिर के साथ तीन मंजिला भवन का निर्माण किया गया है। इसे अभी सुविधाओं से सुसज्जित किया जा रहा है।

तब और अब: बदलते परिवेश में चुनौतियां

मां के दर्शन में असुविधा
1- अतीत में जब शेाभा यात्रा अपने प्रवास में निकलती थी तो जनसंख्या कम होने के कारण श्रद्धालु बड़ी सुगमता से मां के दर्शन कर लेते थे। लेकिन समय के साथ जन सैलाब बढ़ने से शोभा यात्रा के दौरान अनगिनत श्रद्धालुओं को हताश होकर लौटना पड़ता है। मान्यता अनुसार प्रत्येक श्रद्धालु पालकी को स्पर्श कर खुद को पुण्य के भागी मानते हैं। इसमें सुधार की बेहद आवश्यकता है।

भंडारों के बाद पड़ी रहती है गंदगी
पहले शूलिनी मेले के दौरान भंडारों का प्रचलन कम था। इसमें प्रसाद वितरण किया जाता था। लेकिन जब से उदारमना श्रद्धालु भंडारे अनेक स्थानों पर लगाकर पुण्य अर्जन कर रहे हैं, उसी के साथ सफाई की व्यवस्था भी बिगड़ी है। लोगों कोो चाहिए सफाई की समुचित व्यवस्था रखें और श्रद्धालुगण भी सफाई में पूर्ण सहयोग दें। यह तभी संभव है जब प्रत्येक पांडाल पर कूडे़ के लिए कूड़ापात्र सुनिश्चित किए जाएं।

विकास के साथ मेले में बढ़ा हुड़दंग
यह निर्विवाद है कि मां शूलिनी का मेला धार्मिक आस्था से सीधा जुड़ा है। आध्यात्म का प्रचार-प्रसार इसका मुख्य उद्देश्य है। इस सुअवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी उसी परिधि में आयोजित किए जाने चाहिए। इनसे हमारी अतीत की संस्कृति स्पष्ट झलकती हो। लेकिन आज की भौतिक चकाचौंध में इस मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिनमें हो हल्ला और हुड़दंग की अधिक गुंजाइश रहती है। इसके परिणाम बीते वर्षों में सामने आ चुके हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम जन मनोरंजन के साथ प्रेरणादायी भी हों। लोककला को उभारने वाले स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने के साथ साहित्यिक गतिविधियां भी इस मेले कर अंग बनाना जरूरी है।
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