नौणी विवि में राष्ट्रीय संगोष्ठी में मौजूद लोग। स्रोत: नौणी विवि
- फोटो : क्षेत्र पंचायत की बैठक में हंगामा करते लोगों और पुलिस के बीच नोकझोक।
नौणी विश्विद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। नौणी विवि में शुक्रवार को सतत विकास के लिए तालमेल, पादप स्वास्थ्य प्रबंधन में अकादमिक जगत और उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। विशेषज्ञों ने शोध और खेत स्तर पर उसके अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने के लिए शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सशक्त साझेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। संगोष्ठी का आयोजन हिमालयन फायटोपथोलॉजीकल सोसायटी की ओर से विवि के पादप रोग विज्ञान विभाग के सहयोग से किया जा रहा है। देशभर के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और एग्रोकैमिकल उद्योग से 188 से अधिक प्रतिभागी इसमें भाग ले रहे हैं। आचार्य एनजी रंगा कृषि विवि गुंटूर की कुलपति डॉ. आर सारदा जयलक्ष्मी देवी इस अवसर पर बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। उन्होंने अपने संबोधन में वैज्ञानिक खोजों को विस्तार योग्य एवं किसान-हितैषी तकनीकों में परिवर्तित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने आधुनिक कृषि में फफूंदनाशी जैव-कीटनाशकों और पर्यावरण-अनुकूल रासायनिक संरक्षण की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विवि और शोध संस्थान पादप रोगजनकों, होस्ट प्रतिरोध, आणविक निदान एवं समंवित रोग प्रबंधन पर मूलभूत ज्ञान विकसित करते हैं, किंतु इन नवाचारों जैसे प्रतिरोधी किस्में, जैव-फॉर्मूलेशन और डायग्नोस्टिक किट को व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचाने के लिए उद्योग के साथ सहयोग अनिवार्य है। नौणी विवि के कुलपति प्रो राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि प्राकृतिक खेती एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पद्धति के रूप में उभर रही है, जो कई सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है। उन्होंने जोर दिया कि अनुसंधान और तकनीक पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ किसानों के लिए किफायती भी होनी चाहिए। इससे पूर्व हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. सतीश शर्मा ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर के अधिष्ठाता डॉ. मनीष शर्मा ने कहा कि तकनीकी प्रगति के बावजूद उत्पादन वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं है। निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. इंदर देव ने पादप स्वास्थ्य को कृषि का एक प्रमुख स्तंभ बताया और कहा कि रोगों के कारण लगभग 40 प्रतिशत तक फसल हानि होती है, जो खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसानों की आजीविका के लिए गंभीर चुनौती है। सोसाइटी के सचिव डॉ. अनिल हांडा ने वर्ष 2017 में स्थापित सोसायटी की गतिविधियों की जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ. भूपेश गुप्ता द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।