पट्टामोड़ और कायलर के शिव मंदिरों में गुफा से टपकता सफेद पानी और डमरू की आवाज
महाशिवरात्रि और सावन महीने में लगती है भक्तजनोंं की भीड़
संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। देवी-देवताओं की भूमि हिमाचल प्रदेश में कई स्वयं-भू शिवलिंग हैं। इन शिवलिंग की अपनी कई मान्यताएं हैं। हिमाचल की पहाड़ियों में अस्था का प्रतिक बने कई क्षेत्रों के शिवालयों में थप करने से डमरू की आवाज आती है तो कहीं पहाड़ी से सफेद रंग का पानी टपकता हुआ दिखाई देता है। हजारों भक्तों की आस्था का प्रतीक पट्टामोड़ मंदिर के शिवालय में इसी प्रकार से पहाड़ी से आज भी सफेद रंग के पानी को टपकता हुआ देखा जा सकता है। इसी के साथ सोलन स्थित कायलर में शिव ढांक मंदिर में पहाड़ी में थप करने से डमरू की आवाज आती है। यहां पर प्रदेश समेत बाहरी राज्यों से लोग आकर शीश नवाजते हैं और मन्नतें मांगते हैं। वहीं, मंदिरों में कालका-शिमला नेशनल हाईवे पांच पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर पट्टामोड़ भी है। जो लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। मंदिर का इतिहास काफी रोचक है। प्राचीन शिव मंदिर पट्टा का मोड़ डगशाई सैन्य क्षेत्र में आता है। काफी वर्षों पहले यहां पर पहाड़ी के बीच एक गुफा होती थी। इसमें थन दिखाई देते थे और इन थनों से सफेद पानी टपकता था। वहीं साथ ही गुफा में शिव पिंडी भी है। जहां पर आकर सफेद पानी गिरता है। वर्तमान में भी गुफा प्रकृतिक रूप में विराजमान है। बताया जाता है कि 150 वर्ष पूर्व साधु भी यहां पर पूजा-अर्चना करते थे। आजादी के बाद की बात करें तो डगशाई स्कूल को जाने वाले विद्यार्थी पहाड़ी में बनी गुफा में टपकते थनों को देखने का प्रयास करते थे। विद्यार्थी अपने घर में जाकर गुफा के बारे में बताते थे। कुछ वर्षों बाद प्राकृतिक गुफा के बाहर लोगों ने पूजा-अर्चना करनी शुरू की। वहीं लोगों की मन्नतें भी पूरी होने लगी। स्थानीय लोगों ने यहां पर मंदिर निर्माण करने के बारे में योजना बनाई। धीरे-धीरे कर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ और वर्तमान में पट्टा का मोड़ में प्राचीन शिव मंदिर बना है। यहां पर महाशिवरात्रि और सावन महीने में लोगों की अधिक भीड़ उमड़ती है।
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एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है जटोली
जटोली शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश में स्थित है और अपनी ऊंचाई के कारण एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। मंदिर अपने चमत्कारों और शक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। महाशिवरात्रि पर भक्त यहां विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक के लिए आते हैं।