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तैला रोग की चपेट में सैकड़ों किसानों की फसलें

Tue, 16 Feb 2016 06:20 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सोलन
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बीबीएन में क्षेत्र की रबी की फसल तैला (एफिड) रोग की चपेट में आ गई है। इस रोग से किसानों के गेहूं और सरसों के खेत बर्बाद होने की कगार पर हैं। किसानों की हजारों बीघा जमीन इस रोग की चपेट है। इससे किसान घबराए हुए हैं।
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  कृषि विभाग से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर किसानों ने सरकार से पंजाब की तर्ज पर उचित मुआवजे की मांग की है। प्रभावितों का कहना है कि पहले एक तो मौसम की मार पैदावार पर पड़ रही है। ऊपर से एफिड के हमले ने उनकी रही सही खेती भी उजाड़ दी है। इससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।

4 हजार हेक्टेयर में पैदावार
नालागढ़ क्षेत्र में इस वर्ष चार हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की फसल लगाई है। इसमें चार सौ हेक्टेयर जमीन पर बीज का गेहूं तैयार किया जा रहा है। लेकिन एफिड रोग फैलते ही फसल खतरे में पड़ गई है। किसानों को चिंता सता रही है कि अगर इस पर कोई ठोस उपाय नहीं हुआ तो उनकी तैयार फसल बर्बाद हो जाएगी।
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यहां एफिड का सबसे अधिक असर
नालागढ़ के बरुणा, मस्तानपुरा, अंधरोला, मदनपुरा, मझोली, बीड प्लासी, राजपुरा, बघेरी, बेरछा, कश्मीरपुरा के सैकड़ों किसानों की गेहूं और सरसों की फसल में तैला रोग ने हमला कर दिया है। किसान विनोद ठाकुर, रविंद्र ठाकुर, अर्जुन, श्याम ठाकुर, जीतराम, बीड प्लासी हर भजन सिंह, मझोली के प्रधान सुच्चा सिंह, खेड़ा पंचायत के अवतार सिंह सैणी, अंधरोला से गुरदास, मलपुर से दर्शन सिंह ने बताया कि तैला रोग लगने से गेहूं और सरसों की फसल तबाह हो गई है। रोग लगने से खेत के खेत पीले पड़ने शुरू हो गए है।

यह है एफिड रोग
यह एक काले रंग का कीट होता है जो गेहूं और सरसों के पत्तों के ऊपरी तथा निचली सतह पर चिपका होता है। हाथ लगने पर यह किसान के शरीर में चिपक जाता है। हाथ में तेल जैसा पदार्थ लग जाता है। इस कारण इसे तैला कहते हैं। किसान जब खेत से गुजरता है तो उसके कपड़ों में भी यह चिपक जाता है। यह प्रतिदिन हजारों अंडे देते हैं और आगे से आगे फैल जाता है। पत्तों का रस चूस कर उन्हें पीला कर देता है। इसका उपचार नहीं करें तो वह पूरे पौधे को सूखा देता है।

कृषि विभाग ने सुझाए उपाय
कृषि विभाग के विषय वाद विशेषज्ञ डॉ. यादव किशोर गौतम और एडीएम डा. रविंद्र कुमार ने रोग लगने की पुष्टि करते हुए बताया कि किसान फसल पर क्लोरोफाइरीफोस का छिड़काव करें। अगर यह दवाई नहीं मिले तो परोपिकोनाजोल तीन सौ एमएल प्रति एकड़ तथा साइफर मैथरीन 10 ईसी 250 एमएल प्रति एकड़ का छिड़काव करें। बताया कि अचानक तापमान बढ़ने तथा पानी के कमी के चलते यह रोग फसल में आता है। तेज धूप पड़ेगी तो वह स्वयं भी समाप्त हो जाएगा। लेकिन अगर मौसम ऐसा ही रहा तो फसल को अधिक नुकसान कर सकता है।
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