कुनिहार में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान मौजूद भक्तगण। स्रोत : आयोजक
कुनिहार में श्रीमद्भागवत कथा का चौथा दिन, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की सीख
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। कुनिहार में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिन राजा वेन और महाराज पृथु के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथावाचक ने धर्म, न्याय और लोककल्याण का संदेश देते हुए कहा कि जब शासक धर्म से विमुख होकर अहंकार के मार्ग पर चलता है तो प्रजा को कष्ट सहने पड़ते हैं, जबकि धर्मपरायण और प्रजावत्सल राजा के शासन में समाज सुख, शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर होता है।
व्यास आचार्य प्रेमदत्त शर्मा ने कहा कि प्राचीन काल में राजा अंग अत्यंत धर्मात्मा और न्यायप्रिय थे। लेकिन उनके पुत्र वेन का स्वभाव बचपन से ही क्रूर और अहंकारी था। राजा अंग के वन गमन के बाद वेन को राज्य की बागडोर सौंपी गई। किंतु राजा बनते ही उसने यज्ञ, दान, हवन और भगवान की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया तथा स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया। उसके अत्याचारों से धर्म का ह्रास होने लगा और पूरी प्रजा भय एवं कष्ट में जीवन व्यतीत करने लगी। कथा में आगे बताया गया कि राजा वेन के अधर्म के कारण पृथ्वी ने अपनी समस्त उपज और औषधियों को छिपा लिया था। नौ जुलाई से प्रारंभ हुई यह सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा 16 जुलाई तक चलेगी।