सोलन। बेरोजगार मधुमक्खी पालन शुरू कर अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। मधुमक्खी पालन का कारोबार युवा कम निवेश के साथ शुरू कर सकते हैं। यही नहीं इसका खर्चा भी कम है। जहां फूल हैं वहां मधुमक्खियों को रखकर इस व्यवसाय को शुरू किया जा सकता है। इसके अलावा सेब और अन्य फलों के परागण के लिए भी मधुमक्खियों की जरूरत पड़ती है जिसके लिए प्रति बॉक्स के हिसाब बागवान पैसा अदा करते हैं। यह जानकारी नौणी विवि के वैज्ञानिकों ने दी।
नौणी विवि के उद्यानिकी एवं वानिकी विवि में मधुमक्खी पालन पर जागरूकता, प्रेरणा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी शुक्रवार को शुरू हुई। राष्ट्रीय माधवी परिषद द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी का आयोजन विवि का कीट विज्ञान विभाग कर रहा है। कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने शिरकत की। कीट विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू खन्ना और समन्वयक डॉ. हरीश शर्मा ने बताया कि प्रदेश ने प्रबंधित परागण के क्षेत्र में अग्रणी काम किया है। लेकिन इस क्षेत्र में अभी भी सुधार की संभावना है। डॉ. हरीश शर्मा ने कहा कि संगोष्ठी का मकसद किसानों को जागरूक करना है। उन्होंने परागण में मधुमक्खियों की महत्वपूर्ण भूमिका और इसके द्वारा विभिन्न फसलों के उत्पादन क्षमता बढ़ाने की जानकारी दी। इसके अलावा मधुमक्खी पालन, विपणन अवसरों और उत्पादों के मूल्य वृद्धि के बारे में प्रतिभागियों को अवगत करवाया जाएगा।
मधुमक्खी पालन में सुधार की जरूरत : डॉ. शर्मा
नौणी विवि के कुलपति और कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. एचसी शर्मा ने कहा कि मधुमक्खी पालन एक ऐसा उद्यम है जिसमें किसी को एक नया व्यवसाय शुरू करने के लिए बहुत संसाधन की आवश्यकता नहीं है। कहा कि समय की मांग है कि मधुमक्खियों की आनुवंशिक विविधता में सुधार लाया जाए। इससे बेहतर परिणाम मिलेंगे। किसानों से आग्रह किया कि वह अपने पेशे पर गर्व करें ताकि कृषि की तरफ युवाओं को आकर्षित किया जा सके। उन्होंने युवा कृषि स्नातकों को भी कृषि उद्यमी बनने की सलाह दी।
बीएससी में 50 फीसदी सीटें आरक्षित : डीन
उद्यानिकी महाविद्यालय के डीन डॉ. राकेश गुप्ता ने मधुमक्खी पालन से किसानों की आय का दोगुना करने की वकालत की। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों (जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूल से कक्षा 8,10 और 12 की कोई भी दो परीक्षा पास की है) के लिए बीएससी कार्यक्रम में 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। इससे ग्रामीण इलाकों के छात्रों को कृषि का अध्ययन के लिए समान अवसर मिलेंगे।