अमर उजाला ब्यूरो
सोलन। प्रदेश के किसानों को कम लागत और जहर मुक्त खेती के बारे में किसानों को नौणी यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षण देने के लिए आए पद्मश्री सुभाष पालेकर ने देसी केंचुओं की भूमिका के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी में देसी केंचुओं की अहम भूमिका होती है।
ये दिन-रात किसानों के लिए मजदूर की तरह काम करते हैं। उन्होंने बताया सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती जैविक खेती से पूरी तरह भिन्न है इसलिए इसमें बाहर से आयातित किसी प्रकार की वर्मी कंपोस्ट की जरूरत नहीं पड़ती है। बल्कि एक गाय के गोबर और गोमूत्र से ही 30 एकड़ भूमि में खेती की जा सकती है। पालेकर ने किसानों को बताया कि सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती में बाजार से कुछ भी लाने की जरूरत नहीं है।
किसान अपने घर के आसपास मौजूद वनस्पतियों और गाय के गोबर व मूत्र से ही खेती में प्रयोग होने वाले घटकों को बना सकेंगे। उन्होंने दावा किया है कि यह ऐसी खेती विधि है जिसमें खेती के पहले ही वर्ष में बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे और किसानों का उत्पादन बिल्कुल भी नहीं घटता है।
रासायनिक खेती से बढ़ रही बीमारियां
प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के परियोजना निदेशक राकेश कंवर ने कहा कि रासायनिक खेती से बीमारियां बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि रासायनिक खेती से ग्लोबल वार्मिंग बढने के साथ भूजल स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है। छह दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पड़ोसी देश नेपाल से भी दो किसान प्रशिक्षण लेने के लिए नौणी यूनिवर्सिटी में पहुंचे हैं। इसके अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश के किसान भी हिमाचल के नौ जिलों के किसानों के साथ बैठकर पालेकर से प्रशिक्षण पा रहे हैं।