चायल (सोलन)। चायल में वर्ष 2003 से 6 से 7 नवंबर को मनाया जाने वाला दो दिवसीय बाबा भलकू मेला इस बार भी आयोजित नहीं किया गया। इससे जहां एक और क्षेत्र की जनता की भावनाएं आहत हुई हैं, वहीं दूसरी और 19वीं सदी के महान संत बाबा भलकू का अनादर किया जा रहा है।
बाबा भलकू चायल से सटी पंचायत झाजा के निवासी थे और उनकी याद मे वर्ष 2003 में दो दिवसीय मेला मनाए जाने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद कमेटी द्वारा कुछ वर्ष तो इस मेले को बड़ी धूमधाम से मनाया गया, लेकिन उसके बाद इस मेले को बंद कर दिया गया। इसके बाद लोगों की बार-बार मांग करने पर उपायुक्त सोलन ने भलकू कमेटी को तलब कर सहायता राशि प्रदान कर मेला मनाने की बात कही थी। लेकिन इसके बाद मेला तो दूर अब बाबा भलकू की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित भी नहीं किया गया। जबकि इससे पहले उनके नाम पर आयोजित होने वाले मेले के दिन उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए जाते थे। ज्ञात रहे बाबा भलकू वह शख्स थे, जिन्होंने 09 नवंबर 1903 को 115 साल पुराने अब विश्व धरोहर में शामिल कालका शिमला रेलवे मार्ग को बड़ोग से आगे शिमला तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। जब बड़ोग नामक स्थान पर सुरंग नंबर 33 जोकि 1143.61 मीटर लंबी है, जिसके दोनों छोर नहीं मिल पाए तो ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग ने आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद इस सुरंग के दोनों छोर को मिलाना मुश्किल हो गया था। लेकिन इसके बाद बाबा भलकू ने सुरंग के दोनों छोर मिलाकर अंग्रेजों के साथ मिलकर शिमला तक रेलवे मार्ग बनाने में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।
बाबा भलकू मेला कमेटी के अध्यक्ष बीआर मेहता ने बताया कि उनका स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण अब वह इस मेले को आयोजित नहीं कर सकते हैं। यह बात उन्होंने कमेटी उपाध्यक्ष रूप सिंह ठाकुर के समक्ष भी रखी थी। यदि लोग अपना सहयोग दें तो इस मेले को आगे भी मनाया जा सकता था। इस मेले को बंद करने का मुख्य कारण आर्थिक तंगी भी एक कारण रहा है। इसके बारे में उन्होंने जिला प्रशासन को भी बताया है। वहीं उपाध्यक्ष रूप सिंह ठाकुर ने बताया कि उनका भी स्वास्थ्य खराब चल रहा है, जिसके चलते इस बार बाबा भलकू की प्रतिमा पर फूल मालाएं भी अर्पित नहीं कर सके।