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बूढ़ी दिवाली पर भियूरी गीतों से गूंजा गिरिपार क्षेत्र

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गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली पर्व पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान नाटी डालते स्थानीय लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्य़ूरो
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अमर उजाला ब्यूरो
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पांवटा साहिब (सिरमौर)। गिरिपार क्षेत्र की करीब 125 पंचायतों में बूढ़ी दिवाली की धमक चरम पर है। बूढ़ी दिवाली का पर्व कई हिस्सों में एक सप्ताह तक चलेगा। गिरिपार के जागरूक युवाओं के प्रयासों से लुप्त होती कुछ परंपराओं की धमक फिर से लौटने लगी है। गिरिपार के कमरऊ, दुगाना, कांटी मश्वा, शिल्ला, शरली, जामना, पौभार, रांगुवा, कांडो-च्योग व बड़वास समेत गिरिपार में बूढ़ी दिवाली उत्साह से मनाई जा रही है। कमरऊ के निवासी लायकराम तोमर, ध्यान सिंह राणा, मेहर सिंह तोमर, मस्तभोज क्षेत्र के निवासी जोगी राम शर्मा, फतेह सिंह चौहान, बहादुर सिंह, मामराज शर्मा और मोहन चौहान का कहना है कि पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र और जिला सिरमौर के सिरमौर गिरिपार में इन दिनों बूढ़ी दिवाली मनाई जा रही है। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक विरह गीत भियूरी, रासा, नाटियां, स्वांग के साथ साथ बुड़ियातू-हुड़क नृृत्य कर जश्न के रंग में डूबे हैं। सिरमौर माइन संघ के प्रधान मीत सिंह ठाकुर, पूर्व प्रधान कमरऊ पंचायत बहादुर सिंह तोमर, लायक राम तोमर, खजान सिंह शर्मा, खतर सिंह ठाकुर, चतर ठाकुर, मुंशी राम तोमर व अनिल अत्री ने कहा कि गांवों में बूढ़ी दिवाली के त्योहार पर हलड़ात व बुढ़ियातू नृत्य की प्राचीन समय से परंपरा रही है। युवाओं के प्रयासों से यह परंपरा फिर से जीवित हो रही है। इस वर्ष कमरऊ पंचायत में धूमधाम से अर्ध रात्रि के समय हलड़ात निकाली गई और एक समुदाय के लोगों द्वारा बुड़ियात नृत्य कर देव परंपरा को निभाया गया। मुनाणा गांव में बूढ़ी दिवाली पर लोक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। गिरिपार क्षेत्र की बूढ़ी दिवाली ईको फ्रेंडली रहती है। अपने आप में कई अनूठे इतिहास और किदवंतियों को समेटी इस परंपरागत दिवाली में पटाखों को नहीं फोड़ा जाता है। किसी तरह से पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचाई जाती। बूढ़ी दिवाली एक प्रकार से पूरी तरह इको-फ्रेंडली रहती है।
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