गिरिपार के जनजातीय मसले पर मांगी रिपोर्ट
केंद्र के जनजातीय मंत्रालय ने लिखा पत्र
बेवजह अड़ंगे डालने में जुटी अफसरशाही : समिति
अमर उजाला ब्यूरो
राजगढ़ (सिरमौर)। गिरिपार को जनजातीय क्षेत्र और हाटी समुदाय को जनजाति घोषित करने का मामला फाइलों में दबता जा रहा है। इस मामले में अब एथनोग्राफिक (नवंश विज्ञान) का पेच भारी पड़ गया है। भारत सरकार के जनजातीय कार्यमंत्री के सचिव दीपक खांडेकर ने 24 अक्तूबर को प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर कहा कि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया इस मामले को अस्वीकार कर चुका है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह और जनजातीय कार्यमंत्री जुओल ओराम की हाल में हुई बैठक में यह महसूस किया गया कि रिपोर्ट में जो खामियां हैं, इसके बारे में गिरिपार क्षेत्र में रहने वाले हाटी समुदाय की विस्तृत एथनोग्राफिक रिपोर्ट शीघ्र उन्हें भेजी जाए। केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष डॉ. अमीचंद कमल, महासचिव कुंदन शास्त्री और सिरमौर युवा विकास मंच के अध्यक्ष सुनील ठाकुर, महासचिव प्रदीप सिंगटा ने बताया कि सांसद वीरेंद्र कश्यप ने इस मुद्दे को केंद्र में प्रभावी ढंग से उठाया है और उन्हें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी पूरा समर्थन दिया है। यह मामला भाजपा के घोषणा पत्र में वर्ष 2007 से है। पूर्व कांग्रेस सरकार के दौरान प्रदेश के जनजातीय अध्ययन केंद्र की रिपोर्ट कें द्र सरकार को भेजी गई थी, जिस पर केंद्र सरकार ने कुछ खामियों का हवाला देकर पूरा करने को कहा था। इसके बाद सभी खामियां दूर कर केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय को भेजी गई थी लेकिन, अब एथनोग्राफिक रिपोर्ट मांगी जा रही है। केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष डा. अमीचंद कमल ने कहा कि उत्तर भारत में जितनी भी जनजातियां हैं वह एक ही जाति नहीं, बल्कि कई जातियों के समूह हैं। एथनोग्राफिक रिपोर्ट मांगना मामले को महज लटकाना है। यह अफसरशाही का फिजूल का अड़ंगा है। किन्नौर, लाहौल स्पीति और जौंसार बाबर की तर्ज पर गिरिपार क्षेत्र के मूल निवासियों को जनजाति मानकर गिरिपार को जनजातीय क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में वर्ष 2007 से चल रहे इस मुद्दे को भले ही मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर व सांसद वीरेंद्र कश्यप प्रभावी ढंग से उठा रहे हैं, लेकिन अफसरशाही इस मसले पर नए अड़ंगे लगाकर लटकाने में जुटा है। गिरिपार को जनजातीय क्षेत्र लोकसभा चुनाव से पूर्व घोषित करना चाहिए अन्यथा गिरिपार के पौने तीन लाख लोगों के सब्र का बांध टूट सकता है। इसका भारी नुकसान भाजपा को होगा।